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जब भी कोई ख्वाब पूरा हुआ

जब भी कोई ख्वाब पूरा हुआ

मेरा मन जैसे सुनहरा-सुनहरा हुआ

तुमसे जब जब मिलना हुआ

जहन में मेरे एक सवाल पुख्ता हुआ

की इतना हसीना ख्वाब

मेरा न जाने कैसे हुआ

किस तरह न जाने

मेरा मुकद्दर मुझपे मेहरबान हुआ

कैसे मेरे नसीब में फूलो का गुलिस्ता हुआ

कौन से कर्म की

या मेर धरम की

न कहना अब की मैनें लिखने में शर्म की

तुम मिली मुझे

क्यूकि खुदा ने मुझ पर रहमत की

This post was last modified on July 4, 2019 8:51 am