Shayari ki Dukan

24 Jun

रखते हैं एसी ख्वाहिश

जाने अनजाने में
हमारे फसानो में
आप कुछ यूँ शामिल हुए
जिंदगी में हमारी
वो निखर आया
भुला ना पाए
ऐसा प्यार पाया
परेिानियों में करते हैं
आप ही से गुजारिश
सपनो में हमारे रोज़ आया करो
रखते हैं ऐसी ख्वाहिश

24 Jun

मुझसे मेरा साया

मुद्दतो में किसी को
ऐसा प्यार नसीब है होता
वो है बदनसीब जो
उस पर से यकीन है खोता
कहते नहीं बनता
सपने जो था बुनता
हुबहू तुममे पाया
खुदा ने मिलाया
मुझसे मेरा साया

24 Jun

वक़्त भी कर्मो के अधीन

ना डरे
बस करे
वो जिसपे हमें यकीन है
क्यूंकि………..
वक़्त भी कर्मो के अधीन है
जिक्र जब ही से करने लगेंगे
अपनी परेशानियों का
फिक्र नहीं, निभाने लगेंगे
फ़र्ज अपनी जिम्मेदारियों का
फिर धीरे धीरे जीवन संवरने लगेगा
मंजिल दूर ही सही
पर रास्ता सुनहरा बन पड़ेगा

24 Jun

मिल्खा सपनो की खातिर

Inspirational poems

Milka sapno ki khatir

वो बस जीतना चाहते थे
रुकना उन्हें नागवार जो था
मंजिल भी उनका
इंतज़ार कर रही थी
उनका वक़्त घोड़े पर सवार जो था
पांच नदियों के संगम से
जो कहलाया पंजाब
मिल्खा को भी था उस
माँ से प्यार बेहिसाब
लोगों के सपनो के पंख हैं लगते
और मिल्खा सपनो की खातिर
दिन रात थे बस दोड़ते
स्वर्णिम एहसास हमें कराया था
उन्ही की बदौलत जब खेल के मैदान में
तिरंगा हमारा लहराया था
स्वर्ण पदक उनके सीने का
जज्बा देता है ना जाने
कितनो को जीने का

Milka sapno ki khatir

देश भक्ति कविता इन हिंदी
24 Jun

देश भक्ति कविता इन हिंदी

Desh bhakti kavita in hindi

Swami Vivekanand ji

सुनोगे उस नोजवान की दास्तान ,
जिसने हमको डर से लड़ना सिखाया था |
डर किया है कुछ भी तो नहीं ,
हमें अच्छी तरह समझाया था |
सिंघनाद कर आगे बढ़ो ,
उठो, जागो और कुछ तो करो |
भक्त बनो पर कर्म भी तो करो |
यह पाठ पढाया था |
शिक्षा के सही अर्थ को सिखलाया था |
चरित्र निर्माण को सर्वोपरी बताया था |
कितने ही युवको के प्ररक थे वो ,
भगत , सुभाष , अरविन्द घोष
के विचारो के आधार |
उनसे प्रेरणा ले चुके जाने
कितने कलेक्टर बेमिसाल |
कुछ बनना चाहते हो जो
तो जानलो एक बात |
करो खुद पर विश्वास
और आगे बढ़ कर ,
बढाओ दूजे के लिए हाथ |
पढो विवेकानंद को
और ओढो उनके विचार |

Shaheed Bhagat Singh ji

Desh bhakti kavita in hindi

देश भक्ति कविता इन हिंदी

सनक थी कुछ कर जाने की
गोले बारूद उगाने की
दरिंदो की दरिंदगी की
शहादत का अर्थ समझाने की
गुजारिश माँ से किया करते थे
मिटटी का कर्ज चुकाने को
दिन रात तर्पा करते थे
कर्म उनका गीता का ज्ञान बना
चरित्र उनका उनकी ढाल बना
विवेकानन्द को पढ़
उन्होंने खुद पे विशवास था बढाया
हर आम में ख़ास होने का
एहसास था जगाया
छोटी सी उम्र में ऐसा काम कर गए
2 3 मार्च 1931 को वो दिलों में
हमारे अपना नाम कर गए

देश भक्ति कविता इन हिंदी

Desh bhakti kavita in hindi

24 Jun

विवेकानन्द

लोगों ने कहा वो माने नहीं
सब ने कहा उस ओर जाना नहीं
बरखा संग आंधी ने वो राग छेदा
बिजली की कड कडाहट ने भी
उनके संग था नाता जोड़ा
रात है की गुजरना नहीं चाहती थी
भटके मुसाफिर को ओर
भटकना चाहती थी
उन्हें भी मंजिल को पाने
का नशा हो गया था
डर भी जैसे कहीं सो गया था
कमजोरियों को अपनी
वो कर चुके थे दरकिनार
तोड़ चुके थे वो
अंधविश्वास की हर दीवार
मोहताज नहीं थे वो किसी के
अजीज थे वो हर किसी के
सारी दुनिया में रोशन भारत हुआ
संस्कृति का हमारी आदर हुआ

24 Jun

विवेकानन्द

लोगों ने कहा वो माने नहीं
सब ने कहा उस ओर जाना नहीं
बरखा संग आंधी ने वो राग छेदा
बिजली की कड कडाहट ने भी
उनके संग था नाता जोड़ा
रात है की गुजरना नहीं चाहती थी
भटके मुसाफिर को ओर
भटकना चाहती थी
उन्हें भी मंजिल को पाने
का नशा हो गया था
डर भी जैसे कहीं सो गया था
कमजोरियों को अपनी
वो कर चुके थे दरकिनार
तोड़ चुके थे वो
अंधविश्वास की हर दीवार
मोहताज नहीं थे वो किसी के
अजीज थे वो हर किसी के
सारी दुनिया में रोशन भारत हुआ
संस्कृति का हमारी आदर हुआ

24 Jun

विवेकनान्दा और उनके विचार

आँखे उनकी आज भी
जैसे मुझे ही देख रही हैं
सवाल पे सवाल कर रही हैं
कया हुआ उन वादों का
उन लोहे से इरादों का
जिद्द थी ना तेरी
की सुल्झाऊंगा वो अनसुलझी पहेली
माना वक़्त लग रहा है
पल पल रेत सा बह रहा है
इतना सोचा ही था की
चहरे पे मेरे मुस्कान उतर आई
उन्ही की कही बात याि आई
इंसान गुजर जाते हैं
पर उनके विचार
उनके विचार
अपनी मंजिल पा ही जाते है
और कुछ ही देर में हम फिर से
उनके दिए काम में मन लगाते हैं

24 Jun

विवेकनान्दा और उनके विचार

आँखे उनकी आज भी
जैसे मुझे ही देख रही हैं
सवाल पे सवाल कर रही हैं
कया हुआ उन वादों का
उन लोहे से इरादों का
जिद्द थी ना तेरी
की सुल्झाऊंगा वो अनसुलझी पहेली
माना वक़्त लग रहा है
पल पल रेत सा बह रहा है
इतना सोचा ही था की
चहरे पे मेरे मुस्कान उतर आई
उन्ही की कही बात याि आई
इंसान गुजर जाते हैं
पर उनके विचार
उनके विचार
अपनी मंजिल पा ही जाते है
और कुछ ही देर में हम फिर से
उनके दिए काम में मन लगाते हैं

24 Jun

बस कुछ दिन और फिर

कहीं दूर बहुत अँधेरा था
रात सा सन्नाता
चारो और बबिर पड़ा था
और वो रोशनी की चाह लिए
देखे जा रहा था उस आसमान की ओर
जहां बिखरी हुई थी चकाचोंध चारो ओर
सोच में पड़ गया
कुछ ही देर में उसका
अंग अंग खिल गया
कल तक अमावस थी जहां
आज पूनम का चाँद है वहाँ
रोशन फिर तो मेरा जहान भी होगा
बस कुछ दिन और फिर
सब को मुझ पर भी गुमान होगा