Shayari ki Dukan

22 Jun

मंजिल मिल चुकी थी

जाने अनजाने
किसी से गुफ्तगू कर ली
फिर बातों बातों में
दोस्ती कर ली
प्यार के रंग में डूबे जा रहे थे
कसमे -वादे निभाना चाह रहे थे
दोनों अपनी ही बस्ती में खुश थे
भीड़ में थे पर वो गुम थे
हर पल में उनके एक अजब सी
मस्ती घुल चुकी थी
शायद दोनों को अपनी अपनी
मंजिल मिल चुकी थी

22 Jun

बंधन में बंधे हैं

काजल से सजी आँखों में
नज़रें तुम्हारी
कुछ ऐसी सज रही हैं
की कह रहे हैं कुछ
और आप हैं की कुछ
और ही समझ रही हैं
बंधन में बंधे हैं
जहा नियम बड़े कड़े हैं
तेरे इंतज़ार में ना जाने
कब से यही खड़े हैं

22 Jun

मेरा मैं न जाने कहाँ चला गया

देखना उन्हें चाहते हो
जो देख नहीं सकते
जानना उन्हें चाहते हो
जो बन नहीं सकते
उनका हाथ थामने को
बेक़रार बैठे हैं
कुछ उनकी याद में
उदास उदास हैं
भूलने की कोशीश बेकार है
उनका नाम लिया तो
ज़िंदगी भी उड़ने को तैयार है
वरना भटकने में गजुरते
यूँ ही दिन रात हैं
मैं उन्ही से मिलने की खातिर
उस आस्मां की और ताक रहा था
उनको पाने की खातिर
मन को अपने खंगाल रहा था
ना जाने कब समां बदल गया
मेरा मैं न जाने कहाँ चला गया
कब कैसे मैं
उनकी शरण आ गया

22 Jun

इश्क की इन गलियों में

जिन गलियों से गुजरने की
ख्वाहिश लिए चले जा रहे थे
जिस दुपट्टे के सरकने से
हम मचले जा रहे थे
आज उन्ही गलियों में
उसी दुपट्टे के सगं
उड़ने की चाहत
मेरे दिल में यूँ घर कर गयी
इश्क की इन गमलयों में जब
तू मेरी आँखे नम कर गयी
कल रात तमु चुपके से
हमें दुआ सलाम कर गयी

22 Jun

ऐसी दूरी सह न पाएंगे

इंतज़ार की इंतज़ार
करते करते इन्तेहाूँ हो गयी
बाज़ार में खरीददारी
करते करते शाम हो गयी
घंटो राह में आँखे बिछाये थे बैठे
सोच रहे थे
आजकल चुप चुप क्यूँ हैं रहते
भला हमसे अपने दिल की बात
क्यूँ नहीं हैं कहते
वक़्त अब गुजरता नहीं
तू संग है पर
पहले सी मस्तियाँ क्यूँ नहीं
आँखे शरारती अब क्यूँ नहीं
मुझसे शिकायते भला क्यूँ नहीं
ऐसी दूरी सह न पाएंगे
मजाक में भी हम तुमसे
रूठ नहीं पाएंगे

22 Jun

काबिलियत की तेरी

अर्जी को मेरी
मर्जी की तेरी
मोहब्बत को मेरी
इज़ाज़त की तेरी
सलामती को मेरी
हिफाज़त की तेरी
जरूरतों को मेरी
मुद्दतो से तेरी
ज़िन्दगी को मेरी
एक आदद
मुस्कान की तेरी
ख्वाहिशों को मेरी
काबिलियत की तेरी
बस इतना सा जानो
तमु राहत हो मेरी
हम खो बैठे है खुद ही को
हर आहात पे तेरी

22 Jun

याद रखना यह तारीख

Hindi shayari

Yaad rakhna yeh tareekh

वो नादान दीवानी हो रही
जिसकी कहानी
आज आम हो रही
कह रहे हैं आशिक भी
ज़रा याद रखना यह तारीख भी
ए मासूम अनजानी
तुम  हो रही हो सयानी
भूल के भी उन गलियों में न जाना
मासूम कलि यूँहीं किसी की
बातों में ना आना
जब भी दिल अपना लगाना
सोच समझ के फैसला अपना सनाना

Yaad rakhna yeh tareekh

 

22 Jun

वक़्त के साथ साथ

है अजीब ये कहानी
एक दीवाना एक दीवानी
और एक सयानी
दीवाना डूबा रहता था
सयानी के प्यार में
दीवानी बेबस थी
दिवाने के इंतज़ार में
सयानी को यह बात रास न आयी
और दी ने के दिल में
यह बात उसने बैठायी
शादी की कसमो को
उन अनकहे वादों को
निभाना
गुजरी बातो को
अपनी चाहतो को
वक़्त के साथ साथ
भूल जाना
है हमसफ़र वही जो संग
चल रहा है
मैं कुछ भी नहीं
देख तेरी खातिर
दीवानी का दिल मचल रहा है
यह सनु दीवाना भी अब
पल पल बदल रहा है

22 Jun

ये वो अनजाने थे

रंग वही पुराने थे
बस मिल  बैठ कर सजाने थे
कुछ दूर  साथ चले
ये वो अनजाने थे
राग अपने अपने
दोनों ही को सुनाने थे
एक साज़ में बंध चकुे थे
अपनी ही िदुनया में
वो रंग  चुके  थे
हलके से एक दिन आंधी
अहम् की उन दोनों के बीच गहरायी
और िदुनियां उन दोनों ने बढाई
क्या उन्हें एक दूजे की याद ना आई
ये कैसी बेरहम आग
उन्होंने अपने आँगन में लगायी

22 Jun

ये वो अनजाने थे

रंग वही पुराने थे
बस मिल  बैठ कर सजाने थे
कुछ दूर  साथ चले
ये वो अनजाने थे
राग अपने अपने
दोनों ही को सुनाने थे
एक साज़ में बंध चकुे थे
अपनी ही िदुनया में
वो रंग  चुके  थे
हलके से एक दिन आंधी
अहम् की उन दोनों के बीच गहरायी
और िदुनियां उन दोनों ने बढाई
क्या उन्हें एक दूजे की याद ना आई
ये कैसी बेरहम आग
उन्होंने अपने आँगन में लगायी