Shayari ki Dukan

17 Jun

काश भारत में मेरे

काश भारत में मेरे
यूँ धुंधले ना होते  चेहरे ।
काश उड़ सकते पंछी
रात होती  या सवेरे ।
आँगन को मेह्काती बेटी
रख सकती कदम
चाहे होते रातों के अँधेरे |
काश समझ सभी को होती |
मर्यादा  एक मर्द होने की
उन दरिंदों के सिने में भी
काश उमड़ती |
एक कोशिश
आज़ादी को पाने की
बरसों पहले
सीने में हमारे थी सुलगती ।
वक़त की मांग है |
दर्द को झेलने में
नहीं कोई शान है |
अपने पुरषार्थ को जगाना होगा |
धूल खा  रही नैतिकता को
फिर से अपनाना होगा |
राष्ट्रर को  हमें अपने
सुन्दर और सुशील बनाना होगा ।
हर एक को अपने अन्दर के
दरिन्दे को मिटाना होगा ।
हर एक कह अपने  अन्दर के
दरिन्दे को मिटाना होगा ।

 

17 Jun

वहीं तो रचा बसा होता हैं

बेदहसाब किताबे पढ़
कुछ कलमे गढ़
अनजानो ने सराहा
कभी कभी
मलिते मलिते
वो पा जाते हैं दोराहा
उन्हें भाता है रिश्तो का चोराहा
मलिने की आड़ में
खुद की पहचान में
वो बस चाहते हैं इक किनारा
वहीं तो रचा बसा होता हैं
उनकी खुशियों का नज़ारा
तो क्यूँ ना एक बार
ख्वाहिशो को अपनी
बहन दे मंजिलों तक अपनी
जहां बसती हो ऐसी बस्ती
आओ मिलकर करें
कुछ ऐसी करनी

17 Jun

दिल की दरख्वास्त

इस रूह का एक ही मकसद
इश्क में जियें
इश्क में खिलें
इश्क में उडें
इश्क में डाले
एक दूजे की बाहों में
बाहों के हार
नज़रों में तेरी करें
अपनी मंजिलो की तलाश
और बह चले
उन हवाओं की सनसनाती रुत में
जहां हो तो सिर्फ तेरे प्यार की प्यास
कुछ ऐसी ही है
इस छोटे से दिल की दरख्वास्त

17 Jun

मेरी आह निकल रही

कशिश तेरी आखों की
मेरे दिल में
यूँ जगह कर रही
दबी जबान से जैसे
मेरी आह निकल रही
मुस्कान तुम्हारी
होठों पर कुछ यूँ बिखर रही
बड़ी मुश्किल में हैं
हमारी जान
देखो अब कहीं जाके
हमारी सांसें संभल रही

17 Jun

कुछ कहना चाह रही थी

आज वो फिर नज़र आयी
धुंधलाती सी तस्वीर में
रंगों की रंगत ने
जैसे करामात दिखलाई
आज कुछ नया सा एहसास है
उसके हाथों में फिर मेरा हाथ है
लकीरों को खिंचने की चाहत लिए
वो खिलखिलायी
और वो हमारे करीब आयी
नदियों की धारा को लिए
वो बहती ही जा रही थी
धीरे धीरे आँखों में उसकी
शर्म सी छा रही थी
शायद
शायद वो
कुछ कहना चाह रही थी
आज वो हमें फिर से अपना
बना रही थी

17 Jun

राहों में तेरी

वक़्त तो वक़्त है
गुजर जायेगा
पानी भी अपनी राह
खुद ही बनाएगा
राहों में तेरी
मेरा आना
यूँही लगा रहेगा
कोई कुछ कहे
मेरा प्यार तुम्हे
यूँही मिलता रहेगा
जमाने गुजर जायेंगे
हम तुम फिर ना जाने
कितनी दफा
लौट लौट कर आयेंगे

17 Jun

तन्हाइयों क दौर पे दौर

मैं उनको निहारती रही
और वो उसको
मैं उनको बुलाती रही
और वो मिलते रहे उसको
तमन्ना तो मेरी भी थी
की वो मुझे अपना कहते
दर्द को मेरे वो रुसवा करते
तन्हाइयों क दौर पे दौर
गुजर गए
और हम यहाँ खड़े उन्हें
टकते ही रह गए
सिसक इन साँसों की
बयान कैसे करती
अपने इस जख्म को
भला कैसे सहती

17 Jun

दिला देती है एहसास

सफ़र ये आसान नहीं
जब हमदम साथ नहीं
कहीं बादल हैं
पर बरसात नहीं
कहीं उसके थमने के
आसार नहीं
हर ओर से जो
हो चुके थे निराश
आज उनको है अपनी
मंजिल की तलाश
जब लगती है प्यास
सबको होती है एक बूंद
से भी बड़ी सी आस
दिला देती है एहसास
कौन है कितना ख़ास

17 Jun

Lonely Lonely

कितने lonely lonely रहते हैं
तेरे बिना
कर ले यकीन जो भी हम कहते है
ए मेरी हिना
तेरे लबों पे ख़ामोशी
हम क्यूँ सहें
पानी बिन सागर
भला कैसे रहे
तड़प रहे हैं पल पल
कैसे कहें
बन पानी आँखों से तुम्हारी
हम यूँ बहें
की होश में ना तुम रहे
ना हम रहे

17 Jun

मेरी दुनिया बस तुम्ही में

इजाज़त हो जो आपकी
कुछ कहें
बस एक पल को हम आपकी
बाहों में रहे
उल्फतों में उलझने उलझ
रही हैं
मेरी दुनिया बस तुम्ही में
सिमट रही हैं
गिरफ्त की तुम्हारी
आदत हो चली है रानी
तुम्ही से तुम्ही तक है सिमटी
हम और हमारी कहानी