Sad Shayari

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25 Jun

हम मस्त कलंदर

एक नग
जो नथनी बना बैठा है
काजल से तुम्हारी ऐठा ऐठा है
कंगन भी कुछ कम नहीं
पहला दूजे से रूठा बैठा है
पायल भी तुम्हारी
याद में हमारी
गा रही क़वाली
मेरी मासूम कली
मिश्री की डली
रूठो न यूँ की सूना सूना सा
हो जाता है मंजर
ज़रा हंस भी दो की
हो जाये हम मस्त कलंदर

24 Jun

छोटी छोटी बातों पे बिगड़ना

Motivational poetry

Choti choti baton pe bigadna

हर किसी ने
कहीं ना कहीं
कुछ गलत
कुछ सही
है सहा
कुछ ने कहा
कुछ ने सहा
जिक्र कही ना कहीं
सभी ने किया
ऐहतियात बरतना
नए रिश्तो की डोर है
ज़रा नाजुक है
ज़रा संभलना
एक दूजे को समझना
परायो से छुपाना
अपनों से निभाना
वक़्त का काम है गुजरना
अच्छा नहीं होता है
छोटी छोटी बातों पे बिगड़ना गड़ना

Choti choti baton pe bigadna

24 Jun

छोटी छोटी बातों पे बिगड़ना

Motivational poetry

Choti choti baton pe bigadna

हर किसी ने
कहीं ना कहीं
कुछ गलत
कुछ सही
है सहा
कुछ ने कहा
कुछ ने सहा
जिक्र कही ना कहीं
सभी ने किया
ऐहतियात बरतना
नए रिश्तो की डोर है
ज़रा नाजुक है
ज़रा संभलना
एक दूजे को समझना
परायो से छुपाना
अपनों से निभाना
वक़्त का काम है गुजरना
अच्छा नहीं होता है
छोटी छोटी बातों पे बिगड़ना गड़ना

Choti choti baton pe bigadna

24 Jun

मुझसे मेरा साया

मुद्दतो में किसी को
ऐसा प्यार नसीब है होता
वो है बदनसीब जो
उस पर से यकीन है खोता
कहते नहीं बनता
सपने जो था बुनता
हुबहू तुममे पाया
खुदा ने मिलाया
मुझसे मेरा साया

24 Jun

वक़्त भी कर्मो के अधीन

ना डरे
बस करे
वो जिसपे हमें यकीन है
क्यूंकि………..
वक़्त भी कर्मो के अधीन है
जिक्र जब ही से करने लगेंगे
अपनी परेशानियों का
फिक्र नहीं, निभाने लगेंगे
फ़र्ज अपनी जिम्मेदारियों का
फिर धीरे धीरे जीवन संवरने लगेगा
मंजिल दूर ही सही
पर रास्ता सुनहरा बन पड़ेगा

देश भक्ति कविता इन हिंदी
24 Jun

देश भक्ति कविता इन हिंदी

Desh bhakti kavita in hindi

Swami Vivekanand ji

सुनोगे उस नोजवान की दास्तान ,
जिसने हमको डर से लड़ना सिखाया था |
डर किया है कुछ भी तो नहीं ,
हमें अच्छी तरह समझाया था |
सिंघनाद कर आगे बढ़ो ,
उठो, जागो और कुछ तो करो |
भक्त बनो पर कर्म भी तो करो |
यह पाठ पढाया था |
शिक्षा के सही अर्थ को सिखलाया था |
चरित्र निर्माण को सर्वोपरी बताया था |
कितने ही युवको के प्ररक थे वो ,
भगत , सुभाष , अरविन्द घोष
के विचारो के आधार |
उनसे प्रेरणा ले चुके जाने
कितने कलेक्टर बेमिसाल |
कुछ बनना चाहते हो जो
तो जानलो एक बात |
करो खुद पर विश्वास
और आगे बढ़ कर ,
बढाओ दूजे के लिए हाथ |
पढो विवेकानंद को
और ओढो उनके विचार |

Shaheed Bhagat Singh ji

Desh bhakti kavita in hindi

देश भक्ति कविता इन हिंदी

सनक थी कुछ कर जाने की
गोले बारूद उगाने की
दरिंदो की दरिंदगी की
शहादत का अर्थ समझाने की
गुजारिश माँ से किया करते थे
मिटटी का कर्ज चुकाने को
दिन रात तर्पा करते थे
कर्म उनका गीता का ज्ञान बना
चरित्र उनका उनकी ढाल बना
विवेकानन्द को पढ़
उन्होंने खुद पे विशवास था बढाया
हर आम में ख़ास होने का
एहसास था जगाया
छोटी सी उम्र में ऐसा काम कर गए
2 3 मार्च 1931 को वो दिलों में
हमारे अपना नाम कर गए

देश भक्ति कविता इन हिंदी

Desh bhakti kavita in hindi

24 Jun

जाने कहाँ गया वो रेत का बवन्डर

तमन्नाओ के सागर में हिलोरे
ले रही थी जिंदगी मेरी
अकेलेपन में भीगी हुई थी
आदते मेरी
फिर उनसे मुलाक़ात हो गयी
और वो हमारे साथ हो गयी
वो कहती रही हम सुनते रहे
फूल उनकी पसंद के चुनते रहे
हुआ ऐसा जो ना कभी देखा था
कुछ ऐसा जो ना कभी सोचा था
आज चारो ओर है खुशियों का समंदर
जाने कहाँ गया वो रेत का बवन्डर

22 Jun

मेरा मकसद था

कहती हो एहसान
मेरी चाहत से अनजान
लगती हो नादान
ज़रा सुनो
यह प्यार भरा फरमान
अब कुछ भी हो जाए
चाहे हम कितना भी सतायें
या हम तुमसे रूठ जाये
तुम झुकना नहीं
कहने से चूकना भी नहीं
गुनाह को मेरे मैं कुबूल करूूँगा
फिर कभी दोबारा
ना मैं तुमसे लडूंगा
सिर्फ इश्क करूूँगा
इश्क करूूँगा…….
पर इस बात से इत्तेफाक रखना
मेरा मकसद था
बस इक तुम्हारा ख्याल रखना

22 Jun

पत्थर भी सागर में

गहराती दिशाओं की आड़ में
एक हल्की सी लौ
मंद मंद मुस्कुरा रही थी
हर आते जाते को
एक पहेली पूछ रही थी
किसी के समझ ना आये
ऐसी करामात उसने कर दिखाई
भरी बारिश में वो लौ
मशाल बन लहराई
तेज हवाओं की सुलग
उसमे बस चुकी थी
देखने वालों में भी एक नयी
उमंग उमड़ चुकी थी
जीतना जो चाहता है
जीत कर दिखाता है
होंसला हो बुलंद तो
पत्थर भी सागर में
तर जाता है

22 Jun

थोड़ी सी जोर अजमाइश

मुश्किलों को आने की
चुनौती दे दो
मन की आँखों को
ज़रा सा खोल दो
थोड़ी सी जोर अजमाइश
जब वो करने लगे
हर कोशीश में वो
जब तुम्हे ठगने लगे
मौका उन्हें ज़रा भी ना देना
देखना उन्हें संभलने भी ना देना
कुछ ही देर में वो बिखर जायेंगी
देखते ही देखते वो
तुम्हारे कदमो की धूल खायेंगी
मुश्किलों की चुनौनतयां
यूँ ही आएूँगी जायेंगी
जब तुम जैसे होंगे मुसाफिर
वो अपनी राह भटक जायेंगी