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18 Aug

जिसे देखो उस ओर भाग रहा हैं

Inspirational poetry

Jise dekho us or bhag raha hai

जिसे देखो उस ओर भाग रहा हैं

सच कह दो तो

आँखे तान रहा हैं

गफलत सी जिन्दगी हो गयी हैं’

फिर भी सीना ठोक रहा हैं

क्यों भला इंसान अनजाना हो रहा

खुद के है लड़खड़ाते कदम

और ज़माने को सभाल रहा

नजरो की शर्म बची नही

जोश जिन्दगी का

धुआं धुआं हो गया

होश जब आया तो एहसास हुआ

जिन्दगी का साथ

कही पीछे ही छुट गया

Jise dekho us or bhag raha hai

17 Jun

कथा गौशाला की

नदी के दोनों किनारों पर शहर बसे थे | एक शहर में रहन वाले अपने गुजर – बसर के लिए मछलियों पर आर्षित थे | जिसके लिए वह लोग बिना मोटर वाली गाड़ी का प्रयोग किया करते थे | वह शहर था त्रिशाल जहां पर्यटकों का आना –  जाना लगा रहता था | बस्त वाले यहाँ मछली बेचन  जरुर आते थे | सवेरे – सवेरे वहाँ मंडी लग जाती | कुछ 10-15
लोग यहाँ मछली बेचने आते थे और मछलियों की बोलिया लगाते |
जो अच्छी बोली लगाता उस बिचोलिये को सारी मछलिया बेच, वो अपनी बस्ती को लौट जाते | इन्हीं में से कुछ कमाए हुए धन से कुछ ऐसा सामान खरीदते जिसे बस्ती में बेच जा सके | त्रिशाला में होटल व्यवसाय अपने चरम पे था | पर्यटन भी खूब फल फूल रहा था | इन्हीं होटल व्यवसायियों की वजह से बस्त वालो की मछिलिया आसानी से बिक जाती थी |
यह तो हुई त्रिशाला की बात क्यूँ न अब बात क जाए गौशाला की , जो और कोई नहीं त्रिशाला की बहिन है | गौशाला भी नदी किनारे ही बसी थी | जिसे पूजने श्रद्धालु दूर – दूर से आया करते थे | यहाँ मांस-मछली का नाम लेना भी पाप था | गाय की पूजा की जाती , सेवा की जाती बायोगैस प्लांट भी थ वहाँ , नदी के बहाव को विधुत में बदलने की योजना भी क्रियान्वित हो चुकी थी | साफ़ पानी , लहलहाते खेल जहां कोई भी ना था सेठ | सब अच्छा खाते , दूध पीते और मौज में जीते |
त्रिशाला में रहने मछलियो क जब गौशाला के बारे में पता चला तो सभी ने एक राय के साथ त्रिशाला को छोड़ने का प्रस्ताव पारित किया | अब सभी मछलिया ही ना रही तो लोगो के भूखे मरने के दिन आ गए , होटल व्यवसायी भी परेशान थे , और मछलियों के मुंह मांगे दाम भी देने को तैयार थे | पर जब मछलिया ही नहीं बची तो को क्या करे | आखिर कोई कितना सहे | जहां त्रिशाला में एक समय पर्यटकों का हुजूम लगा रहता था , वही उनकी तादाद ना के बराबर हो गयी क्यूंकि ज्यादातर पर्यटक बाहर देश के थे, जो मांस-मच्छी पसंद करते थे पर जब उन्हें भोजन में यह सब नहीं मिला तो उन्होंन वहाँ आना कम कर दिया और धीरे-धीरे बिलकुल बंद | त्रिशाला की वित्तीय स्थिती दयनीय हो चुकी थी | बहुत समय बाद त्रिशाला में आये एक पर्यटक ने जब देखा की हालात नाज़ुक है तो उसने जानने की कोशिश की और उसे पता चला की अब यहाँ मछलिया नहीं मिलती | नदी के रास्ते ही वह आया था और उसी रास्ते उसने जाने का निर्णय लिया , आगे जब वह गौशाला की तरफ गया तो देखा की यहाँ तो मछलियों के झुण्ड के झुण्ड हैं | एक बार को तो उसे यकीन ही नहीं हुआ , दुसरे ही क्षण उसे तरकीब आयी की क्यूँ ना मछलियों को यहाँ से पकड़ कर त्रिशाला में बेच जाए | यह तो धन कमाने का आसान तरीका होगा | उसने एक लड़के को कुछ रूपये दिया और उससे मछलियों को पकड़ने को कहा | पैसों के लालच में उसने मछलिया पकड़ कर इस पर्यटक को दे दी |
जब वह लड़का घर पर पैसा ले गया और उसके पिताजी ने पूछा बेटा पैसे कहाँ से लाये , तो उसने सारी बात बता दी | पिता ने लड़के को समझाया की ,ऐसा करना अच्छा काम नहीं | इस तरह तो उस जिव – हत्या का पाप लग गया है और आगे से उसे ऐसी गलती ना करने की तथा अगर कोई फिर से ऐसा करने को कहे तो स्वयं को बताने के लिए कहा | अगले दिन जब वह पर्यटक फिर से यहाँ आया तो , गौशाला के लोगों ने उसे पकड़ लिया और उसे यहाँ की आस्थाओं से अवगत कराया | तभ वो पर्यटक खुद को दोषी समझ रोने लगा और प्रायश्चित करने की बात सोचने लगा | गौशाला में आकर वह चकित हो गया था | जब वह अपने देश लौटा तो उसने सभी को गौशाला की बात कह सुनाई | इस तरह गौशाला में देखते ही देखते पर्यटकों का हुजूम सा दिखने लगा l|अब हर हर शहर हौशला जैसा और सोचना चाहता था | संचार क्रांति के कारण गौशाला इन्टरनेट की दुनिया पर छा गई | दुसरे देश के लोग यहाँ की ही तरह अब गायों की सेवा करने लगे | धीरे – धीरे बीमारियों का नामो निशान भी इस दुनिया से जाता रहा | त्रिशाला भी अब गौशाला जैसा दिखाई देती थी |
त्रिशाला को यह बात रास नहीं आई , की उसकी बहिन का नाम पुरे विश्व में फ़ैल रहा है | त्रिशाला ने सोचा की वह तपस्या करेगी और उसे उसका फल भी मिलेगा क्यूंकि अब वो भी पवित्र हो चुकी है (त्रिशाला में लोग गौसेवा जो करते हैं ) | सदियाँ गुजर गयी त्रिशाला तप करती रही , अंततः प्रभु प्रकट हुए और उससे वर मांगने को कहा | त्रिशाला ने माँगा की उसका नाम पुरी दुनिया में फ़ैल जाए , वो जो कुछ भी करें उसे पाप ना चढ़े , चाह जीव हत्या ही क्यूँ ना हो | साथ ही साथ लोगो को गौशाला का नाम भी याद ना रहे | जैसे ही त्रिशाला ने अपनी बात कही , उसकी आँखे चौंधिया गयी और उसने देखा की समस्त देवी – देवता गौशाला की काया में समाये हैं l यह देख वह हैरान थी | वह परेशान थी की जिसे वह अपनी शत्रु समझती थी वह तो जगतमाता है | जगतमाता ने कहा तथास्तु , त्रिशाला यह सुन अवाक रह गयी | यह सब उसकी सोच के विपरीत था | फिर जगतमाता अर्द्श्य हो गयी | त्रिशाल फुले नहीं समा रही थी l अब जब उसे वर मिल ही चुका था , जो श्राप से कम ना था | तभी त्रिशाला में एक भंवर सा उठा और त्रिशाला पाताल में पहुच गयी ,  गौशला से बहुत दूर |
यहाँ पाताल में कोई भी गौशाला को नहीं जानता था और तो और इस घटना के बाद पुरी दुनिया में त्रिशाला की चर्चा होने लगी क्यूंकि रातोंरात त्रिशाला का नामो- निशान मिट चुका था | एक और त्रिशाला परेशान थी l वही पाताल म जीव हत्या एक आम बात थी | त्रिशाला को बंदी बना लिया गया क्यूंकि पाताल वासियों ने सोचा यह त्रिशाला की एक चाल है , ताकि वो पाताल पर राज कर सके क्यूंकि उन्हें त्रिशाला के तप के बारे में ज्ञान था |
पाताल भी त्रिशाला की काया देख मोहित हो गया तथा हाथों – हाथ उसने त्रिशाला के सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया | त्रिशाला ने जान बचाने की खातिर उसका यह प्रस्ताव मंजूर कर लिया | पाताल में जश्न होने लगा | अब त्रिशाला और पाताल में कोई फर्क नही रहा | कहते हैं न सांगत का असर होता है | जैसे गौशाला असर बाकी दुनिया की काया पर हुआ | उनकी सोच पर हुआ | पर जलन की वजह से त्रिशाला को अपना भला ही नागवार जुगार और अंततः उसे ना चाहते हुए भी पाताल से विवाह करना पडा | पाताल त्रिशाला पर कुछ ज्यादा ही मोहित था | एक दिन त्रिशाला ने पाताल को सारी बात बता दी | पाताल ने पूछा की तुम मुझसे कया चाहती हो | उसने कहा आप मेरे स्वामी हैं | अतः मेरे शत्रु आपके शत्रु , मेरी प्रतिज्ञा आपकी प्रतिज्ञा पाताल तो वैसे ही त्रिशाला पर मोहित था | सो वह अपनी धर्म पत्नी के लिए गौशाला पर हमला करने की तैयारी करने लगा | वह जब गौशाला पर हमला करने गया तो उन्हीं पर मोहित हो गया और वही का होकर रह गया | वह गौशाला को निहारता दिन – रात बिताने लगा , वो सोच में पड़ गया की गौशाला कैसे किसी की शत्रु हो सकती है | अतः वह चाहते हुए भी गौशाला पर हमला ना कर सका और वही  बस जाने की सोचने लगा पर कुछ समय बाद उसने सोचा की त्रिशाला को समझाना होगा और उसे बताना होगा की बेवजह की शत्रुता में किसी का फायदा नहीं | जब पाताल त्रिशाला से दूर था , तो त्रिशाला भी अपने पति के बिना बमुश्किल वक्त बिता पा रही थी | अतः उसने पाताल के पास जाने का निश्चय किया पाताल के बदले हुए रूप को देखकर हैरान थी , उसे लगा की उसका पति गौशाला के प्रेम में पड़ गया है | जब वह पाताल के पास गयी तो , पाताल ने उसे बहुत समझाया | त्रिशाला को मन में तसल्ली हुई की मेरा पति अब भी मुझसे ही प्रेम करता है और मेरे कहने पर गौशाला पर हमला करने को अब भी तैयार है ,पर वह यह भ जानती है की इस सब में खोना तो उसे ही अपने पति को पड़ेगा | अतः पति अपने पति के साथ पाताल लौट गयी |

17 Jun

कथा गौशाला की

नदी के दोनों किनारों पर शहर बसे थे | एक शहर में रहन वाले अपने गुजर – बसर के लिए मछलियों पर आर्षित थे | जिसके लिए वह लोग बिना मोटर वाली गाड़ी का प्रयोग किया करते थे | वह शहर था त्रिशाल जहां पर्यटकों का आना –  जाना लगा रहता था | बस्त वाले यहाँ मछली बेचन  जरुर आते थे | सवेरे – सवेरे वहाँ मंडी लग जाती | कुछ 10-15
लोग यहाँ मछली बेचने आते थे और मछलियों की बोलिया लगाते |
जो अच्छी बोली लगाता उस बिचोलिये को सारी मछलिया बेच, वो अपनी बस्ती को लौट जाते | इन्हीं में से कुछ कमाए हुए धन से कुछ ऐसा सामान खरीदते जिसे बस्ती में बेच जा सके | त्रिशाला में होटल व्यवसाय अपने चरम पे था | पर्यटन भी खूब फल फूल रहा था | इन्हीं होटल व्यवसायियों की वजह से बस्त वालो की मछिलिया आसानी से बिक जाती थी |
यह तो हुई त्रिशाला की बात क्यूँ न अब बात क जाए गौशाला की , जो और कोई नहीं त्रिशाला की बहिन है | गौशाला भी नदी किनारे ही बसी थी | जिसे पूजने श्रद्धालु दूर – दूर से आया करते थे | यहाँ मांस-मछली का नाम लेना भी पाप था | गाय की पूजा की जाती , सेवा की जाती बायोगैस प्लांट भी थ वहाँ , नदी के बहाव को विधुत में बदलने की योजना भी क्रियान्वित हो चुकी थी | साफ़ पानी , लहलहाते खेल जहां कोई भी ना था सेठ | सब अच्छा खाते , दूध पीते और मौज में जीते |
त्रिशाला में रहने मछलियो क जब गौशाला के बारे में पता चला तो सभी ने एक राय के साथ त्रिशाला को छोड़ने का प्रस्ताव पारित किया | अब सभी मछलिया ही ना रही तो लोगो के भूखे मरने के दिन आ गए , होटल व्यवसायी भी परेशान थे , और मछलियों के मुंह मांगे दाम भी देने को तैयार थे | पर जब मछलिया ही नहीं बची तो को क्या करे | आखिर कोई कितना सहे | जहां त्रिशाला में एक समय पर्यटकों का हुजूम लगा रहता था , वही उनकी तादाद ना के बराबर हो गयी क्यूंकि ज्यादातर पर्यटक बाहर देश के थे, जो मांस-मच्छी पसंद करते थे पर जब उन्हें भोजन में यह सब नहीं मिला तो उन्होंन वहाँ आना कम कर दिया और धीरे-धीरे बिलकुल बंद | त्रिशाला की वित्तीय स्थिती दयनीय हो चुकी थी | बहुत समय बाद त्रिशाला में आये एक पर्यटक ने जब देखा की हालात नाज़ुक है तो उसने जानने की कोशिश की और उसे पता चला की अब यहाँ मछलिया नहीं मिलती | नदी के रास्ते ही वह आया था और उसी रास्ते उसने जाने का निर्णय लिया , आगे जब वह गौशाला की तरफ गया तो देखा की यहाँ तो मछलियों के झुण्ड के झुण्ड हैं | एक बार को तो उसे यकीन ही नहीं हुआ , दुसरे ही क्षण उसे तरकीब आयी की क्यूँ ना मछलियों को यहाँ से पकड़ कर त्रिशाला में बेच जाए | यह तो धन कमाने का आसान तरीका होगा | उसने एक लड़के को कुछ रूपये दिया और उससे मछलियों को पकड़ने को कहा | पैसों के लालच में उसने मछलिया पकड़ कर इस पर्यटक को दे दी |
जब वह लड़का घर पर पैसा ले गया और उसके पिताजी ने पूछा बेटा पैसे कहाँ से लाये , तो उसने सारी बात बता दी | पिता ने लड़के को समझाया की ,ऐसा करना अच्छा काम नहीं | इस तरह तो उस जिव – हत्या का पाप लग गया है और आगे से उसे ऐसी गलती ना करने की तथा अगर कोई फिर से ऐसा करने को कहे तो स्वयं को बताने के लिए कहा | अगले दिन जब वह पर्यटक फिर से यहाँ आया तो , गौशाला के लोगों ने उसे पकड़ लिया और उसे यहाँ की आस्थाओं से अवगत कराया | तभ वो पर्यटक खुद को दोषी समझ रोने लगा और प्रायश्चित करने की बात सोचने लगा | गौशाला में आकर वह चकित हो गया था | जब वह अपने देश लौटा तो उसने सभी को गौशाला की बात कह सुनाई | इस तरह गौशाला में देखते ही देखते पर्यटकों का हुजूम सा दिखने लगा l|अब हर हर शहर हौशला जैसा और सोचना चाहता था | संचार क्रांति के कारण गौशाला इन्टरनेट की दुनिया पर छा गई | दुसरे देश के लोग यहाँ की ही तरह अब गायों की सेवा करने लगे | धीरे – धीरे बीमारियों का नामो निशान भी इस दुनिया से जाता रहा | त्रिशाला भी अब गौशाला जैसा दिखाई देती थी |
त्रिशाला को यह बात रास नहीं आई , की उसकी बहिन का नाम पुरे विश्व में फ़ैल रहा है | त्रिशाला ने सोचा की वह तपस्या करेगी और उसे उसका फल भी मिलेगा क्यूंकि अब वो भी पवित्र हो चुकी है (त्रिशाला में लोग गौसेवा जो करते हैं ) | सदियाँ गुजर गयी त्रिशाला तप करती रही , अंततः प्रभु प्रकट हुए और उससे वर मांगने को कहा | त्रिशाला ने माँगा की उसका नाम पुरी दुनिया में फ़ैल जाए , वो जो कुछ भी करें उसे पाप ना चढ़े , चाह जीव हत्या ही क्यूँ ना हो | साथ ही साथ लोगो को गौशाला का नाम भी याद ना रहे | जैसे ही त्रिशाला ने अपनी बात कही , उसकी आँखे चौंधिया गयी और उसने देखा की समस्त देवी – देवता गौशाला की काया में समाये हैं l यह देख वह हैरान थी | वह परेशान थी की जिसे वह अपनी शत्रु समझती थी वह तो जगतमाता है | जगतमाता ने कहा तथास्तु , त्रिशाला यह सुन अवाक रह गयी | यह सब उसकी सोच के विपरीत था | फिर जगतमाता अर्द्श्य हो गयी | त्रिशाल फुले नहीं समा रही थी l अब जब उसे वर मिल ही चुका था , जो श्राप से कम ना था | तभी त्रिशाला में एक भंवर सा उठा और त्रिशाला पाताल में पहुच गयी ,  गौशला से बहुत दूर |
यहाँ पाताल में कोई भी गौशाला को नहीं जानता था और तो और इस घटना के बाद पुरी दुनिया में त्रिशाला की चर्चा होने लगी क्यूंकि रातोंरात त्रिशाला का नामो- निशान मिट चुका था | एक और त्रिशाला परेशान थी l वही पाताल म जीव हत्या एक आम बात थी | त्रिशाला को बंदी बना लिया गया क्यूंकि पाताल वासियों ने सोचा यह त्रिशाला की एक चाल है , ताकि वो पाताल पर राज कर सके क्यूंकि उन्हें त्रिशाला के तप के बारे में ज्ञान था |
पाताल भी त्रिशाला की काया देख मोहित हो गया तथा हाथों – हाथ उसने त्रिशाला के सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया | त्रिशाला ने जान बचाने की खातिर उसका यह प्रस्ताव मंजूर कर लिया | पाताल में जश्न होने लगा | अब त्रिशाला और पाताल में कोई फर्क नही रहा | कहते हैं न सांगत का असर होता है | जैसे गौशाला असर बाकी दुनिया की काया पर हुआ | उनकी सोच पर हुआ | पर जलन की वजह से त्रिशाला को अपना भला ही नागवार जुगार और अंततः उसे ना चाहते हुए भी पाताल से विवाह करना पडा | पाताल त्रिशाला पर कुछ ज्यादा ही मोहित था | एक दिन त्रिशाला ने पाताल को सारी बात बता दी | पाताल ने पूछा की तुम मुझसे कया चाहती हो | उसने कहा आप मेरे स्वामी हैं | अतः मेरे शत्रु आपके शत्रु , मेरी प्रतिज्ञा आपकी प्रतिज्ञा पाताल तो वैसे ही त्रिशाला पर मोहित था | सो वह अपनी धर्म पत्नी के लिए गौशाला पर हमला करने की तैयारी करने लगा | वह जब गौशाला पर हमला करने गया तो उन्हीं पर मोहित हो गया और वही का होकर रह गया | वह गौशाला को निहारता दिन – रात बिताने लगा , वो सोच में पड़ गया की गौशाला कैसे किसी की शत्रु हो सकती है | अतः वह चाहते हुए भी गौशाला पर हमला ना कर सका और वही  बस जाने की सोचने लगा पर कुछ समय बाद उसने सोचा की त्रिशाला को समझाना होगा और उसे बताना होगा की बेवजह की शत्रुता में किसी का फायदा नहीं | जब पाताल त्रिशाला से दूर था , तो त्रिशाला भी अपने पति के बिना बमुश्किल वक्त बिता पा रही थी | अतः उसने पाताल के पास जाने का निश्चय किया पाताल के बदले हुए रूप को देखकर हैरान थी , उसे लगा की उसका पति गौशाला के प्रेम में पड़ गया है | जब वह पाताल के पास गयी तो , पाताल ने उसे बहुत समझाया | त्रिशाला को मन में तसल्ली हुई की मेरा पति अब भी मुझसे ही प्रेम करता है और मेरे कहने पर गौशाला पर हमला करने को अब भी तैयार है ,पर वह यह भ जानती है की इस सब में खोना तो उसे ही अपने पति को पड़ेगा | अतः पति अपने पति के साथ पाताल लौट गयी |

15 Jun

कृतिका की ताशु

आज कृतिका को देखने लड़क वाले आ रहे हैं । सभी घर वाले तैयारियों में मशरूफ हैं । सभी के दिल में यही ख्याल है की कृतिका को लड़का पसंद आ जाए । कृतिका से छोटी दो और बहिने है । कृतिका की उम्र भी निकल जा रही है , और छोटी बहने बड़ी हो रही हैं। कृतिका के पिता नहीं हैं , उनका स्वर्गवास लंबी बीमारी के चलते हो गया था । तभी से घर की जिम्मेदारी कृतिका ही संभाल रही है। कृतिका मेहनती थी , तभी तो सरकारी नौकरी का इम्तिहान पास कर वो सरकारी मुलाजिम हो चुकी थी , वही पर एक सहकर्मी रवि से उसकी मुलाकात हुई और मन ही मन वप उसे चाहने लगी , पर दिल की बात जुबान पर आते – आते रुक जाती । वो चाह कर भी अपने दिल की बात रवि से ना कह सकी । वैसे रवि कई दफा बातों – बातों में कृतिका के सामने शादी का प्रस्ताव रख चुका है । जो वो हंसके टाल जाती थी । आज रवि ही के घर वाले कृतिका को देखने आ रहे हैं। कृतिका रवि के घर वालो को बेहद पसंद आई और दोनों परिवारों की रज़ामंदी से उनका रिश्ता भी तय हो गया । रवि और कृतिका अब पति – पत्नी हो चुके थे । दोनों बहुत खुश थे और उनके परिवार भी । शादी के बाद लड़के बदल जाते हैं – यह बात कृतिका की सहेली ने कुछ दिन पहले बातों – बातों में कृतिका से कही थी । जब से कृतिका क शादी रवि से पककी हुई , तभी से उसे यह बात बार – बार याद आ रही थी। शादी के बाद से कृतिका इतनी चुप – चुप सी रहने लगी । रवि सोच में था हमेशा खिलखिलाने वाली कृतिका इतनी चुप – चुप क्यों रहने लगी है। रवि ने कृतिका से जब इस बात करनी चाही , तो कृतिका ने पहले तो कहा कोई बात नहीं , पर जब रवि ने ज़ोर दिया । तो कृतिका ने बताया की कैसे उसे अपनी सहेली की बात बार बार याद आ रही है , जिसक वजह स वो कुछ परेशान सी है । यह बात सुनते ही रवि ने कृतिका को अपनी बाहों में भर लिया । कृतिका ने इतना सुकून न पहले कभी महसूस नहीं किया था , जितना आज रवि की बाहों में महसूस कर रही थी। वो पल था और आज का पल कृतिका की जिन्दगी बहुत प्यार में गुज़र रही थी । शादी के एक साल बाद कृतिका और रवि माता पिता बन चुके थे । ताशु नाम की गुडिया ने उनकी झोली खुशियों से भर दी , उन्हें लग जैसे ज़माने भर म वो सबसे खुशकिस्मत हैं । रवि और कृतिका की जिन्दगी ताशु के इर्द गिर्द घुमने मने लगी । ताशु भी धीरे धीरे बड़ी हो रही थी और संस्कारी भी । सभी कृतिका और रवि की परवरिश की सराहने किया करते । अब जब भी कभी कृतिका को अपनी सहेली की बात याद आती की शादी के बाद लड़के बदल जाते हैं , वो शर्मा जाती और सोचने लगती की अगर रवि ने उस दिन समझदारी ना दिखाई होती तो मैं खुद की जिन्दगी रवि पर शक कर क जाने  किस दोराहे पे ल जाती । कृतिका अब समझ चुकी थी की खुशिया अपने ही हाथों में है , क्योंकि हमारी सोच भी हमारी अपनी ही बनायीं होती है ।

***************

अपनों को अपनों की
सपनो को सपनो की
अपनों के सपनो को
सपनो में अपनों की
इतनी सी ख्वाहिश को
पूरा करने को
अपनों की इजाजत की
रब की इबादत की
बस एक चाहत की
और एक कदम बढाने की
जरूरत महसूस जो करो
तो सपनो में अपनों को
शामिल किया करो

***************

15 Jun

ब्लैक To White

हमारी जिन्दगी के हर रंग से कहीं न कहीं CONNECTED ही होता है पैसा , वो पैस जो हमारी जिन्दगी को आसान बना देता है ,  बशर्त उसमे प्यार हो , मोहब्बत हो , किसी अपने का साथ हो , और जिन्दगी मेहरबान हो ।
आज एक कहानी उस पैसे की सुनाते हैं , जो कहाँ का कहाँ पहुँच जाता है । मैं एक रूपये 500 का नोट हूँ । 12 DEC 2004 को मेर जन्म हुआ और हमारे बाप का चेहरा मेरी पहचान बना । RBI से SBI पहुंचा और वहाँ से एक आम इंसान की जेब में , जो मुझे रखना तो बहुत चाहता है , पर बेचारे के महीने के खर्चे ही उसे महीने के आखिर में कर्जदार बना देते है । जिसका एक भरा पूरा परिवार हो , जिसकी आँखों म जीवनसाथी के लिए बेहिसाब प्यार हो , पर कमबख्त वक्त यही दगाबाज़ हो उस की कद्र भला कौन करे । सरकारी अस्पताल में माँ को भर्ती कराया था उसने , डॉकटर ने कहा ऑपरेशन करना पड़ेगा । पर डॉकटर को ऑपरेशन से पहले की बड़ फ़ीस भी तो देनी थी । सो मैं अब डॉकटर साहब का हो चुका था । देखा आपने मैं कैसे आम आदमी की जेब से डॉकटर साहब के महंगे पर्स में समा गया । डॉकटर साहब फ़ोन पर बतिया रहे थे । कहीं किसी डील की बात हो रही थी । उन्होंने मुझे एक सूटकेस में रख दिया । जहां मुझ जैसे जाने कितने ही नोट थे । वो भी मेरी ही तरह जाने कहाँ –कहाँ से आये थे । सुनने में आया डॉकटर साहब कोई ज़मीन का सौदा करन जा रहे थे ।
मैंने सुन वो कह रहे थे 60% सूटकेस में हैं और 40% का चेक है । वो किसी बिल्डर से बात कर रहे थे । साथी बताने लगे हम सब ब्लैक मनी हैं । मैंने पूछा भल वो कैसे , त वो कहने लगे लगता है तू नया आया है , सुन अगर यह डॉकटर हमार जानकारी सरकार को दे दे तो उसे टैकस चुकाना पड़ेगा और अगर ज्याद शॉपिंग करे , महंगी गाडिया ख़रीदे तो इनकम टैकस की RAID भी पड सकती है । आजकल सबसे सेफ तरीका है काले को सफ़ेद में बदलने का प्रॉपटी खरीदो 50 की और रजिस्ट्री कराओ 20 की हो गये ना 30 काल वाले सफ़ेद । यह इंसान बड़ा तेज़ होता है । एक और किस्सा सुनाऊूँ एक शोरुम के मालिक का पहले मैं वही था । मैंने देखा साल भर वहाँ मक्खियाँ उड़ती थी और मगर फिर भी कोई कस्टमर आता तो कोई डिस्काउंट नहीं , कहते फिक्स्ड रेट है , आइटम आउटडेटेड हो रहे थे , पर मालिक के चहरे पर शिकन तक नहीं थी समझ में नहीं आता था । यह परिवार को कमा के क्या खिलाता होगा । पर जब उसके और उसके परिवार क ठाठ देखे तो लगा जैसे कोई पुराना रईस है । पर बाद में समझ आय वो तो कुछ और ही धंधा करता था , वो भी ऐसा चाहे मार्किट कितना ही मंदा हो , पर खूब दौड़ता था उसका धंधा । मैंने पूछा भाई ऐसा कैसा बिजनस था । त वो कहने लगा तू अभी बच्चा है नहीं समझेगा । बातों – बातों में , कुछ चंद मुलाकातों में मैं बड़ा हो गया । मैंने सुना था अगर कभी बैंक जाओ तो समझ लेना की उस दिन , हम सफ़ेद ह जायेंगे । अरे नहीं यह कोई बैंक नहीं लगता , अरे यह तो पोस्ट ऑफिस है भला मेरा यहाँ क्या काम । आज मुझ जैसो के बदले कोई किसान विकास पत्र लिया जा रहा था । वहाँ पोस्ट ऑफिस के कर्मचारी बतिया रहे थे की 01 जनवरी 2015 से 2005 से पहले के नोट बंद हो रहे हैं और जब से यह खबर आई है मुझ जैसे जाने कितने ही आज रिटायर होने को पोस्ट-ऑकिस में भर्ती हो रहे हैं । चलो कम से कम मोदी सरकार की वजह स जीवन के आखरी क्षण तो राहत में गुजरेंगे । और जो रिटायर नहीं हुए वो देश की प्रगति में हाथ बताएँगे । आप सभी से गुजारिश है मुझ जैसे नोट को अगली दफा निर्जीव ना समझना । और फिर कभी न कहना की पैसा हाथों की मैल होता है । मैल तो इंसान की नीयत में छुपा मैंने बेहद करीब से देखा है ।

15 Jun

मेरी पहचान

कभी-कभी मन में आता है की सब शोर शांत हो लिए , कहीं दूर जाएँ और खुद से मुलाक़ात कर आयें पर इंसान इस कदर दुनियादारी में उलझा पड़ा है की मंदिर जाने के पहले भी उसे स्वयं का अपॉइंटमेंट लेना पड़ता है ।मगर जरा सोच के देखो क्या ऐसा हो सकता है की हम इस दुनिया में रहके इससे अलग हो जाएँ ।पर एक काम जरुर कर सकते हैं । वो है स्वयं की एक अलग दुनिया बसाएं । जो पसंद ह वो स्वयं करें मस्ती में जिएं यह जीवन यूँही चलता रहेगा हमारे चेहरे बदलते रहेंगे । पर कितनी ही सदियाँ बीत जाएँ , हम अपने अस्तित्व को चाह के भी नहीं मिटा पाएंगे । जो कोशिश करनी ही है तो खुद की कमियों को दूर करने की करें , बाकी सबकुछ हमारी राह ढूंढता हमारी ओर आ जायेगा ।
नदी किनारे एक साधु बैठे ताप कर रहे थे । तभी एक पुरुष रोता – रोता साधु के पास आया और बोलने लगा मेरा पूरा परिवार मुझे छोड़ गया । मुझे अपन शरण ले लो अब तो यह जीवन आपकी ही सेवा में गुजरना चाहता हूँ ।
साधु बाबा ने उसके सर पे हाथ फेरते कहा बेटा हम तो दिन रात यहीं ताप करते हैं , उस प्रभु को याद करते हैं । जो तुम हमारी सेवा करोगे तो हमारा ध्यान भटक जाएगा । तुम भी यहीं बैठ जाओ और उस प्रभु का ध्यान करो बाबा पर में अपने परिवार को खोके कैसे …….. और वो रोने लगा । बाबा बोले बेटे जैसी करनी वैसी भरनी |
तभ वो रोते-रोते रुका और बोला बाबा मैं तो हर पल अपने परिवार की खुशियों के बारे में सोचता और करता था । कहीं कोई दुःख उन्हें घेर ना ले इसलिए आगे से आगे उनकी हर ख्वाहिश का ख्याल रखता था ।
तभी बाबा बोले हम आज की बात नहीं कर रहे पिछले जन्म में तूने अपने परिवार को बहुत दुःख दिए , कभी-भी उनकी परवाह नहीं की , न माता – पिता की , ना धर्म पत्नी की यहाँ तक की अपने बच्चो की भी नहीं । तब तूने उनके साथ रहते भी उनका कभी साथ नहीं दिया । इसी कारण वो आज तुम्हे छोड़ के चले गए । पर वो किर से तुम्हार जीवन में आयेंगे और कहीं फिर से तुम वो गलती ना दोहराओ इसलिए कहता हूँ की उस प्रभु का स्मरण करो और उस प्रकाश को अपन जीवन में विराजमान करो की अन्धकार कितना ही छा जाए तुम्हारे अन्दर जो लौ जलती रहे आने वाला वक्त बड़ा बलवान होता है जरुरी है इस पल का सदुपयोग और इतनी बात सुनते ही वो वहाँ से उठा और अलग जाकर प्रभु का स्मरण करने लगा । बरसो तपस्या करने के बाद वो प्रभु को प्यारा हुआ और किर से इस धरती पे जन्म लिया । बचपन गुजरा , जवानी आई , धीरे-धीरे उसके भीतर एक हलचल सी होने लगी और उसे मंदिर जाकर वक्त बिताना अच्छा लगने लगा परन्तु धीरे-धीरे उसमे आडम्बर के प्रति आकर्षण जागने लगा , जीवन यूही गुजरने लगा ।
उसकी भक्ति की चर्चा चारो और होने लगी । लोग अपनी समस्याएं लेकर उनके पास आते और उनसे हल बताने की कृपा करत जल्द ही उनका प्रभु के पुत्र के रूप में गुणगान होने लगा। लोग उन पर आँखे मूँद कर विश्वास करने लगे । पर कहते है ना जब लोग आप के पीछे चलने लगते है तो कई बार ऐसा होता है की उनका मार्गदर्शन भी अपना ध्यान भटक जाता है । उसे पद का मोह , अपना अभिनन्दन रास आने लगता है और दूसरो को राह दिखता – दिखता खुद ही भटक जाता है | जहाँ पहल वो हर कार्य के पहले प्रभु का स्मरण करता था , वही अब वो चाटुकारों से घिरा रहने लगा तथा इंसानों को उंच-नीच की भावना से देखने लगा उसके चाटुकारों की सोच उस पर हावी होने लगी ।
तभी उसने एक विवादित फैसला लिया । कथित नीच जाती वालो के मंदिर में प्रवेश पर रोक लगा दी । कुछ दिन यूँही बीत गए । फिर एक दिन उन्हीं के कुछ शिष्यों ने षड्यंत्र कर उन्हें जहर खिला दिया । इस प्रकार वे फिर से अपन शरीर छोड़ गए । कुछ समय पश्चात जब उनके द्वारा रचित उंच – नीच का भेदभाव पुरे समाज को ग्रास बन निगल रहा था तब एक निर्धन तथा कथित नीच परिवार में उन्होंने फिर से जन्म लिया । आज उन्हें उसी मंदिर में जाने की अनुमति ना थी जहां क वो सर्वसर्वा हुआ करते थे । उन्होंने कई प्रयास किये ताकि यह भेदभाव मिटाया जा सके । उन्होंने इश्वर की उपासना का अनूठा तरीका ढूढ निकाला उन्होंने कहा इश्वर मंदिर में ही नहीं अन्यथा सर्वत्र हैं । हम सब में विराजमान हैं इन सब बातों का मैथ वालो ने खुलकर विरोध किया । पर धीरे – धीरे लोग उन्हें सुनने दूर – दूर से आने लगे , पर समाज क ठेकेदारों को यह सब नामंजूर था । अतः उन्होंने उन्हें उनके परिवार सहित कहीं दूर समुंद्र पार कारावास में डलवा दिया । एक – एक कर परिवार का हर सदस्य संसार को चद चला गया और उन्हें भी अधमर जान नदी किनारे फेक दिया गया | वहाँ उनकी भेंट उन्हीं साधु से हुयी । उन्होंने साधु को प्रणाम किया साधु ने उनके सर पे हाथ फेरा तो उन्हें सारे पिछल जन्मो का ज्ञान हो आया । जैसे  ही साधु की आूँखों में देखा उन्हें अपनी गलती का एहसास हो गया और परिवार बिना खुद को निर्जीव समझ अपनी देह त्याग दी ।
आखिर ऐसा क्या हुआ की साधु की आँखों में देखते ही उन्हें अपने परिवार की याद आई और उन्होंने क्यूँ सवाल नहीं किया की मेरे साथ ऐसा क्यूँ हुआ। दरअसल उन्हें समझ आ गया क जो जीवन हमें प्रभु ने दिया है उसका सही अर्थ तभी निकलेग जब हम उनके द्वारा सौंपे गए हर कर्म का निर्वाह सही से करें , ना की हमें अपनी जिम्मेदारियों से भागना है , इस तरह हमें खुद को देवता समझने की भूल भी नहीं करनी अन्यथा उसका प्रायश्चित हमें अपनों से दूर रहकर ही करना पड़ेगा । एक इंसान के लिए सबस जरूरी कुछ है तो अपने परिवार के हितों का ध्यान रखना , उन्हें प्यार करना , अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करना ।
अब जब वे पुनः इस प्रथ्वी पर लौटे तो अपने परिवार की हर छोटी – बड़ी ख़ुशी समझते थे । अपने परिवार के संग समय व्यतीत करते तथा काम मन लगाकर करते , झूठे दिखावे से दूर रहते किसी की तारीफ़ सुन सातवे आसमान में नहीं चढ़ते । अपने परिवार के लिए कुछ करके ही उन्हें ख़ुशी मिलती । इस तरह प्यार की राह पर चलते – चलते उन्होंने अपना यह जीवन बिताया ।

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दूर हुई
उनक जीवन से मोह माया ।
बदल गयी उनकी काया ।
भरी धुप में भी रहती थी
उनके जीवन में छाया ।
आज जाके मैंन जीने का
असली ढंग पाया ।
खुशनसीब हूँ की मैंने ऐसा
सुंदर परिवार पाया ।

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14 Jun

आर्यन -The Hero

रोज़गार की खोज में एक नौजवान निकल पड़ा था । किस ओर जाये इस ख्याल में जा बैठा पीपल की छांव में । किर ज्यों ही उसने आूँखें बंद की । ना जाने कब उसकी आँख लग गयी। दोपहर की शाम हो आयी। बांसुरी की मधुर धुन जैसे उसी को पुकार रही थी । सपनो की दुनिया उसे भरपूर संभाल रही थी। देर रात भूख के मार वो नींद से जागा । उसे किसी के कदमो की आवाज आयी। दो चोर खेत में से बोरियां चुराने की बातें कर रहे थे। नौजवान चुपके से उनके पीछे चल दिया। वो चोर जैसे ही चोरी को अंजाम देते उसके पहले युवक ने उन पर लाठियों से प्रहार कर दिया।
शोर सुन गाँव वाले इकटठे हो गए। जब उन्हें सारी बात पता चली तो पहले तो चोरों की जमकर पिटाई की । और उस युवक का धन्यवाद किया तथा उसकी आवभगत में लग गए। सुबह गाँव में यह बात आग की तरह फ़ैल गयी की किस तरह नौजवान ने बहादुरी का परिचय देते हुए चोरों की पर्ची काटी। युवक गाँव के बहुत कहने पर वो दो दिन के लिए उनका मेहमान हो गया। युवक गाँव की सैर को निकला । उसने देखा की गाँव में बिजली की समस्या है। इसी वजह से किसान कुएं से पानी निकाल कर सिंचाई कर रहे हैं। रात को भी अंधेरे का फायदा उठा चोर चोरी को अंजाम दे रहे थे।
नौजवान को ग्रामीणों की समस्या साफ़ साफ़ दिखायी दे गयी थी। क्यूंकि नौजवान पढ़ा लिखा था। उसे गाँव की समस्या का एक ही समाधान नज़र आया। और वो थी electricity । मगर गाँव में बिजली कैसे आएगी। युवक ने इतना भर सोचा ही था की एक ग्रामीण दुखी होता शहर से लौट रहा था । युवक ने पूछा भैया क्या हुआ । किसान कहने लगा शहर की मंडी बड़ा बुरा हाल है भाई , कितना ही बढ़िया किस्म का अनाज़ हो , किर भी मंडी में अच्छा भाव ही नहीं मिलता । तभी युवक को एक बात याद आयी ।
एक दिन जब वो चाय की दुकान पर चाय पी रहा था । कुछ लोग मंडी की ही तो बातें कर रहे थे , की कैस वो सब मिलकर मंडी में भाव घटाया व बढाया करते हैं। बेचारा किसान अच्छे दामों की आस में मंडी का गोदाम किराये पे लेता है । कुछ दिनों में किराए की रकम चुकाते चुकाते वो परेशान हो अनाज़ उन गिने चुने व्यापारियो को बेच जाता है । जो जानते बुझते अच्छे किस्म के अनाज़ को कम दाम में खरीदते हैं और बाज़ार में उसी अनाज़ के मुंह मांगे दाम मांगते हैं । बेचारा किसान करे भी तो कया करे। युवक सोच में था , की किस तरह से गाँव की मुसीबतों को दूर किया जाए।
वो खुद से ही सवाल कर रहा था , की आखिर हमारे कृषि -प्रधान देश में किसान की ऐसी कैसी दुर्दशा है। तभी उसे यह भी पता चला की गाँव में छोटी- मोटी संस्थाएं हैं वो किसानों को ऋण तो देती हैं पर बदले में भारी ब्याज वसूलती हैं। और अगर किसी कारण से ऋण न चुका पाएं तो उनकी ज़मीनों के कागज़ात विदेशी बैंकों ने गिरवी रख दिए जाते हैं । यह हमारे देश की त्रासदी ही है की युवा भी गाँव से शहर की और पलायन कर रहे हैं । और तो और एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखते । क्या हमारी पढाई हमें इतना भर भी लायक नहीं बनाती की हम उनके सुनहरे भविष्य की कल्पना कर सकें।
हम यह कयों नहीं समझते की अगर हमारे देश में किसान का ऐसा बुरा हाल होगा तो आने वाले वक्त में हमें शायद अनाज़ भी भारी मात्र में आयात करना पड़ेगा। क्यूंकि किसानों की अगली पीढ़ी अगर अपनी ज़मीनें builders को बेच देंगी तो हम चाह कर भी देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पे नहीं ला पायेंगे। युवक को समझ ही नहीं आ रहा था वो करे तो क्या करे । वो गाँव मदद करना चाहता था ।पर क्यूंकि वो स्वयं रोज़गार की तलाश कर रहा था ,वो चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा था।
युवक ने गाँव के कुछ पढ़े लिखे युवको से इस मसले पर बातचीत की उन्ही में एक जिसका नाम सुरेन था उसने युवक से उसका परिचय पूछा युवक ने बताया उसका नाम आर्यन है और वह इस गाँव के लिए कुछ करना चाहता है और साथ ही उन सभी का साथ । आर्यन वैसे भी उन सभी नज़रो में हीरो बन चुका था (कल रात की घटना के बाद) । सो सुरेन ने आश्वासन दिया की वो अपने सभी साथियों को एकत्रित करेगा और आगे की रणनीति के लिए कल सभी की आर्यन से मुलाकात भी करायेगा । आर्यन खुश था लेकिन एक बात उसे सोचने पर मजबूर कर रही थी की क्या सब उसका साथ देंगे ।
आर्यन ने कल की तैयारियाँ शुरू कर दी। भोर हो चुकी थी सुरेन सभी को लेके पहुूँचता ही होगा आर्यन सोच रहा था। जब सुरेन 10-12 साथियों के साथ आर्यन के पास पहुंचा और सुरेन न जब आर्यन का परीचय अपने साथियों से , यह कह करवाया की यही ह जो है हमारी ही उम्र के पर इनकी सोच हमसे कहीं आगे की है क्यूंकि जितना हम अपने गांव को जानते हैं उससे कहीं ज़्यादा इन्हें पता है हमारी और हमारे गाँव की असली समस्याएं । आर्यन ने सुरेन का शुक्रिया अदा किया और कहा की आप मुझ शर्मिदा कर रहे हैं | जो सपना हम सभी का है उसे अब हम सब ही मिल कर पूरा करेंगे।
राइ का पहाड़ बनाना – यह कहावत तो आपने सुनी ही होगी, ओर ना चाहते हुए भी हम इसे इतनी तन्मयता से अपन जीवन में उतारे हुए हैं की हमें भी नहीं मालूम, अगर हम इसे त्यागदे तो हम अपने आप के लिए ख़ुशी के कितने ही द्वार अपने लिए खोल सकते हैं । अगर उर्जा सही दिशा में लगाय जाए तो अविश्वनीय परिणाम आ सकते हैं। हम दिन भर में ना जाने कितने ही ख्याली पुलाव बनाते हैं, और सच्चाई के सामने आते ही हालातों को दोषी ठहराते हैं। धैर्य नाम के साथी का साथ हम लेना ही नहीं चाहते।
हम मंदिर जाते हैं पूजा करते हैं , मुराद मांगते हैं और टेलीफोन रिंग बजती है तो सोचते हैं भगवान् ने मेरा काम कर दिया। हम हमेशा output के बारे में सोचते हैं input apply करते वक्त भी। अगर माँ खाना बनात वक्त सही मसालों का इस्तेमाल ना करे तो क्या खाना स्वादिष्ट बना पाएगा? लक्ष्य की सोच कर अगर हमारे प्रयास में तेजी और पैनापन आता है तो हम अपनी मंजिल के और करीब आते हैं । वही negative approach रखने वाले हमेशा लक्ष्य और प्रयास किये जा रहे वक्त की स्थिति के बीच की खाई को ही नापते हैं और उदासीन हो जाते हैं।
सोच कर देखिए अगर 400m दौड़ में runner अगर हर 100m पर घडी देखे तो क्या वो  अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर पायेगा। जरूरत तो है घडी देखने की पर उस समय जब 400m का distance cover हो जाए। हमें समझना होगा की हर प्रयास हमें लक्ष्य की ओर ही धकेलता है, बशर्त अगर हम विफलता का आकलन कर अपनी नकारात्मकता को दूर करें । हम क्यों विफल होने पर हालातों को दोषी ठहराते हैं। वही अगर सफल हो जाएँ तो उन हालातों के बारे में ज्यादा ना सोचते हुए इस सफलता को अपना मान लेते हैं। पर यह सफलता नाममात्र है।
सफलता में इन हालातों के मायने आप विवेकानन्द , रानी लक्ष्मीबाई , शहीद भगत सिंह से जानिये । इन सभी के लिए सफलता प्रयासों में निहित थी। ना की किसी विषय – वस्तु की प्राप्ति में। आज हमारे लिए सफलता का मतलब है , अपने काम की तारीफ़ बॉस के द्वारा , करीबी दोस्तों के द्वारा, परिवार के द्वारा आदि । इसका मतलब मैं , मेरे कार्य दूसरों के मोहताज रहते हैं। मैं अपनी असफलता का बखान दिन में जाने  कितनी बार खुद से , अपने दोस्तों से करता हूँ। पर मेरी सफलता को , उसके लिए किये गए मेरे प्रयत्नों को ज़ुबान नहीं मिलती।
हम क्यों खुद ही को कमजोर बनाय जा रहे हैं। कुछ बुरा होने के पहले हम खुद को इतना डरा देते हैं की हम ही खुद को खुद ही से अलग कर देते हैं , तो हम अपने इस बुरा वक्त में किसी ओर से क्या उम्मीद लगा सकते हैं। कई बार तो हम खुद को दया का पात्र तक बना बैठते हैं। अगर गेंदबाज़ और बल्लेबाज़ अपनी पुरानी performances की सोच को खुद पर हावी करेंगे त वो कभी भी अपना सर्वश्रेष्ट्र नहीं देगे । Confusion को अगर अपनी जिन्दगी से आउट करना है तो उसका सबसे आसान तरीका है priority set , जी हाँ अपने जीवन में अपने करीबियों को priority no. देना शुरू कर दे । अपने परिवार , दोस्तों , ऑकिस , girl friend और सबसे जरुरी आपका लक्ष्य , सभी को no. देकर क्रम बद्ध कर दीजिये और कुछ समय की practice के बाद आप इस क्रिया में सहज महसूस करेंगे ।

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चुनौतियों की कसक पे
खरा उतरूंगा
बेलगाम दौड़ते इस वक़्त के
हर इम्तिहान की कसौटी पे
मैं खुद को परखूगा
जो कुछ ना कर सका
अपने डर को ना हर सका
तो कह दूगा इस दुनिया से
चला था अपनी हस्ती बनाने को
कया हुआ जो राख में मिल गयी
हमारे सपनो की उड़ाने
किर भी……….
हम भूलेंगे नहीं
हम टूटेंगें नहीं
क्योंकि हम हैं
अपने सपनों के दीवाने
सच्चे परवाने
हर फिक्र से अनजाने
बस कहते रहो खुद से
करना है करेंगे
हर चुनौती से लड़ेंगे
और…………..
अपने डर से ना डरेंगे

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“जो हारना जानता है उसे जितने से कोई नहीं रोक सकता”

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हम वर्तमान में कार्य की विधि और उसकी पूर्णता पर ध्यान केंद्रित करने की वजह , भविष्य में उसके द्वारा प्राप्त होने वाली सुविधाओं पर क्यों ध्यान क्रेंदित करते हैं। जीवन में हर कार्य के होने का अपना से होता है । उदाहरणार्थ :- किसान कृषि के शुरूआती समय अपना पूरा ध्यान ज़मीन की किस्म व मौसम के आधार पर फल, सब्जी अन्यथा अनाज का चयन न करे और साथ ही साथ ज़मीन की पोषकता को बढ़ाने के उपाय ना करे । तो क्या अच्छी फसल की उम्मीद क जा सकती है । इसी सवाल में हमारा जवाब छुपा है ।
आर्यन की बातों का जादू सभी पर हो चुका था। और अब सब आर्यन का साथ देने को तत्पर नज़र आ रहे थे । अब सभी आर्यन से यही जानना चाहते थे , की शुरुवात कहाँ से और कैसे की जाए । आर्यन ने बताया की शुरुवात हमें अपने घर से ही करनी है । हमें अपने – अपने खेतों की फल और सब्जियां एक जगह एकत्रित करनी होंगी । अब हम मंडी के भरोसे अपनी मेहनत को यूँही ज़ाया होते नहीं देख सकते हमें मंडी के सामानांतर अपनी स्वयं की मंडी खड़ी करनी ही होगी और इसके लिए हम technology का साथ लेंगे और स्वयं की ऑनलाइन मंडी भी बनाएंगे जहां आस-पास के गाँव और शहरों में हम अपने हल , सब्जियां व अनाज की पैदावार से पहले ही बुकिंग भी कर सकेंगे । शुरुवात में थोड़ी सी मुश्किल होगी और उससे बचने का एक तरीका है की हम अपनी पैदावार का 25℅ हिस्सा ही शुरू में स्वयं बेचेंगे और बाकी बचा 75℅ शहर की मंडी में । हम ऑनलाइन बुकिंग के साथ अपनी पैदावार को छोटे-छोटे outlets के द्वारा आस-पास के गाँव और शहरों में बेचेंगे । साथ ही अपनी ऑनलाइन बुकिंग का प्रचार भी उन outlets पर करेंगे । हमारा second step होगा ज़्यादा से ज़्यादा गाँवों को अपनी मुहिम का हिस्सा बनाना । क्योंकि ऐसा करने से हमारी पैदावार का market स्वतः ही बढ़ जायेगा और साथ ही अन्य गाँवों का भी । धीरे-धीरे हमारी शहर की मंडी पर dependency कम हो जायेगी और उन की कालाबाज़ारी पे लगाम भी लग जाएगी ।