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एक महात्मा हमारे जीवन में उतरा

चुन चुन के खुशियाँ
उसकी झोली में भर
घूंगरू से प्यार बेपनाह कर
राजू ने रोज़ी के
दिल के आँगन में
ऐसा गुलिस्तान बसाया
की फूनों की खुशबूं से
रोजी का पल पल महकाया
दोनों कि दुनीया
गजब की सज चुकी थी
राजू के माथे पे
रोजी के पैरो की धुल थी
दुनिया कह रही थी
रोजी भी ओरों के कहने में आ
राजू को खुद से दूर कर चुकी थी
हाँ वो रोयी थी
पछताई भी थी
शायद यही राजू के प्यार की
गहरायी थी
वहाँ राजू तो खुद को बदल चुका था
उस खुदा का उसे एहसास
जो हो चला था
लोगों के विश्वास से
उसे भी आस का साथ हो चला था
एक महात्मा हमारे जीवन में उतरा
जिसने कहा था हम ही हैं
उस खुदा का कतरा कतरा

This post was last modified on September 9, 2017 10:11 am

Alok Yadav :