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ऊूँची उड़ान भरने को

तरक्की की चाहत लिए
वो बस चल दिए
किसी ने रोका
किसी ने टोका
शायद वो उनकी
फितरत से अनजान थे
या यूँ कहे की नादान थे
ऊूँची उड़ान भरने को
उनके पंख फड फड़ा उठे
कुछ नया करने की आदत में
वो बरसो की नींद से जाग उठे
बैठे -बैठे वो भी सपनो में ढूब जो जाते
कुछ करने के वक़्त बस बाते वो बनाते
तो हम थे जहा बस वही रह जाते
चूल्हा जलाने की खातिर
हम तुम आज भी
पत्थरों को रगड़ खिलाते

This post was last modified on September 9, 2017 10:10 am

Alok Yadav :