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विवेकानन्द

लोगों ने कहा वो माने नहीं
सब ने कहा उस ओर जाना नहीं
बरखा संग आंधी ने वो राग छेदा
बिजली की कड कडाहट ने भी
उनके संग था नाता जोड़ा
रात है की गुजरना नहीं चाहती थी
भटके मुसाफिर को ओर
भटकना चाहती थी
उन्हें भी मंजिल को पाने
का नशा हो गया था
डर भी जैसे कहीं सो गया था
कमजोरियों को अपनी
वो कर चुके थे दरकिनार
तोड़ चुके थे वो
अंधविश्वास की हर दीवार
मोहताज नहीं थे वो किसी के
अजीज थे वो हर किसी के
सारी दुनिया में रोशन भारत हुआ
संस्कृति का हमारी आदर हुआ

Categories: Hindi Shayari
" Alok Yadav : ."