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विवेकनान्दा और उनके विचार

आँखे उनकी आज भी
जैसे मुझे ही देख रही हैं
सवाल पे सवाल कर रही हैं
कया हुआ उन वादों का
उन लोहे से इरादों का
जिद्द थी ना तेरी
की सुल्झाऊंगा वो अनसुलझी पहेली
माना वक़्त लग रहा है
पल पल रेत सा बह रहा है
इतना सोचा ही था की
चहरे पे मेरे मुस्कान उतर आई
उन्ही की कही बात याि आई
इंसान गुजर जाते हैं
पर उनके विचार
उनके विचार
अपनी मंजिल पा ही जाते है
और कुछ ही देर में हम फिर से
उनके दिए काम में मन लगाते हैं

Alok Yadav :