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आशा को तुम्हारी|

आशा को तुम्हारी

तन्नाओ को हमारी

चाहत को तुम्हारी

कोशिशों को हमारी

मंजिलो के दायरे में खुद को यूँ बांध दिया था

क्यूकि अपनों की खातिर ठानी थी कुछ करने की

फिर अपनों ने ही सवाल किये

अपनों ने ही इलजाम दिए

बेहतरी को उनकी मुकाम समझा था

इस बीच उन्होंने हमें न जाने क्या क्या समझा था

कहते हैं जख्म और जहर हम ही से हैं

उन्हें नहीं पता फ़िकर में उनकी हम कब ही से हैं

कुछ साल गुज़र जाने दो

दौर वो भी जल्द आएगा

जब तुम्हारे दिल में भी बस नाम हमार रह जायेगा

बस नाम हमारा रह जाएगा

This post was last modified on August 6, 2017 8:52 am

Alok Yadav :