आओ इंसानियत सिख ले

13 Jun आओ इंसानियत सिख ले

किस्मत भी क्या – क्या खेल  खिला रही |
रोते हुए को हंसा रही |
कहीं जख्मों पर मरहम लगा रही I
अन्जाने में की गलती तो शायद खुदा भी माफ़ कर दे |
पर जब कोई खुद ही को खुदा समझे ,
तो नाटक के बीच ही में गिर जाते हैं परदे |
एक छोटी सी भूल बरसों पीछे ले जाती है |
मैं की आग में जान छटपटाती है |
हम क्यूँ न इस मैं को जीत ले |
इंसान हैं हम , आओ इंसानियत सींख ले |