जरा सम्भल के

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25 Jun जरा सम्भल के

जिनको समझ नहीं थी
वो बोल रहे थे
खुली हवा में ज़हर घोल रहे थे
पोल खुली तो
नजर वो आये नहीं
और सीधे साधे कभी
किसी को भाए नहीं
नज़र जो खुल भी जाए
वक़्त के गुजर जाने के बाद
तो कोई कैसे हो आबाद
जरा सम्भल के
जाने कहाूँ छुपा हो अगला दगाबाज़