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मेरा मैं न जाने कहाँ चला गया

देखना उन्हें चाहते हो
जो देख नहीं सकते
जानना उन्हें चाहते हो
जो बन नहीं सकते
उनका हाथ थामने को
बेक़रार बैठे हैं
कुछ उनकी याद में
उदास उदास हैं
भूलने की कोशीश बेकार है
उनका नाम लिया तो
ज़िंदगी भी उड़ने को तैयार है
वरना भटकने में गजुरते
यूँ ही दिन रात हैं
मैं उन्ही से मिलने की खातिर
उस आस्मां की और ताक रहा था
उनको पाने की खातिर
मन को अपने खंगाल रहा था
ना जाने कब समां बदल गया
मेरा मैं न जाने कहाँ चला गया
कब कैसे मैं
उनकी शरण आ गया

This post was last modified on September 9, 2017 10:15 am