तन्हाइयों क दौर पे दौर

17 Jun तन्हाइयों क दौर पे दौर

मैं उनको निहारती रही
और वो उसको
मैं उनको बुलाती रही
और वो मिलते रहे उसको
तमन्ना तो मेरी भी थी
की वो मुझे अपना कहते
दर्द को मेरे वो रुसवा करते
तन्हाइयों क दौर पे दौर
गुजर गए
और हम यहाँ खड़े उन्हें
टकते ही रह गए
सिसक इन साँसों की
बयान कैसे करती
अपने इस जख्म को
भला कैसे सहती