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वहीं तो रचा बसा होता हैं

बेदहसाब किताबे पढ़
कुछ कलमे गढ़
अनजानो ने सराहा
कभी कभी
मलिते मलिते
वो पा जाते हैं दोराहा
उन्हें भाता है रिश्तो का चोराहा
मलिने की आड़ में
खुद की पहचान में
वो बस चाहते हैं इक किनारा
वहीं तो रचा बसा होता हैं
उनकी खुशियों का नज़ारा
तो क्यूँ ना एक बार
ख्वाहिशो को अपनी
बहन दे मंजिलों तक अपनी
जहां बसती हो ऐसी बस्ती
आओ मिलकर करें
कुछ ऐसी करनी

This post was last modified on September 9, 2017 10:16 am

Alok Yadav :