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ये वो अनजाने थे

रंग वही पुराने थे
बस मिल  बैठ कर सजाने थे
कुछ दूर  साथ चले
ये वो अनजाने थे
राग अपने अपने
दोनों ही को सुनाने थे
एक साज़ में बंध चकुे थे
अपनी ही िदुनया में
वो रंग  चुके  थे
हलके से एक दिन आंधी
अहम् की उन दोनों के बीच गहरायी
और िदुनियां उन दोनों ने बढाई
क्या उन्हें एक दूजे की याद ना आई
ये कैसी बेरहम आग
उन्होंने अपने आँगन में लगायी

This post was last modified on September 9, 2017 10:15 am

" Alok Yadav : ."