ऊूँची उड़ान भरने को

25 Jun ऊूँची उड़ान भरने को

तरक्की की चाहत लिए
वो बस चल दिए
किसी ने रोका
किसी ने टोका
शायद वो उनकी
फितरत से अनजान थे
या यूँ कहे की नादान थे
ऊूँची उड़ान भरने को
उनके पंख फड फड़ा उठे
कुछ नया करने की आदत में
वो बरसो की नींद से जाग उठे
बैठे -बैठे वो भी सपनो में ढूब जो जाते
कुछ करने के वक़्त बस बाते वो बनाते
तो हम थे जहा बस वही रह जाते
चूल्हा जलाने की खातिर
हम तुम आज भी
पत्थरों को रगड़ खिलाते