विवेकानन्द

24 Jun विवेकानन्द

लोगों ने कहा वो माने नहीं
सब ने कहा उस ओर जाना नहीं
बरखा संग आंधी ने वो राग छेदा
बिजली की कड कडाहट ने भी
उनके संग था नाता जोड़ा
रात है की गुजरना नहीं चाहती थी
भटके मुसाफिर को ओर
भटकना चाहती थी
उन्हें भी मंजिल को पाने
का नशा हो गया था
डर भी जैसे कहीं सो गया था
कमजोरियों को अपनी
वो कर चुके थे दरकिनार
तोड़ चुके थे वो
अंधविश्वास की हर दीवार
मोहताज नहीं थे वो किसी के
अजीज थे वो हर किसी के
सारी दुनिया में रोशन भारत हुआ
संस्कृति का हमारी आदर हुआ