विवेकनान्दा और उनके विचार

24 Jun विवेकनान्दा और उनके विचार

आँखे उनकी आज भी
जैसे मुझे ही देख रही हैं
सवाल पे सवाल कर रही हैं
कया हुआ उन वादों का
उन लोहे से इरादों का
जिद्द थी ना तेरी
की सुल्झाऊंगा वो अनसुलझी पहेली
माना वक़्त लग रहा है
पल पल रेत सा बह रहा है
इतना सोचा ही था की
चहरे पे मेरे मुस्कान उतर आई
उन्ही की कही बात याि आई
इंसान गुजर जाते हैं
पर उनके विचार
उनके विचार
अपनी मंजिल पा ही जाते है
और कुछ ही देर में हम फिर से
उनके दिए काम में मन लगाते हैं