काश भारत में मेरे

17 Jun काश भारत में मेरे

काश भारत में मेरे
यूँ धुंधले ना होते  चेहरे ।
काश उड़ सकते पंछी
रात होती  या सवेरे ।
आँगन को मेह्काती बेटी
रख सकती कदम
चाहे होते रातों के अँधेरे |
काश समझ सभी को होती |
मर्यादा  एक मर्द होने की
उन दरिंदों के सिने में भी
काश उमड़ती |
एक कोशिश
आज़ादी को पाने की
बरसों पहले
सीने में हमारे थी सुलगती ।
वक़त की मांग है |
दर्द को झेलने में
नहीं कोई शान है |
अपने पुरषार्थ को जगाना होगा |
धूल खा  रही नैतिकता को
फिर से अपनाना होगा |
राष्ट्रर को  हमें अपने
सुन्दर और सुशील बनाना होगा ।
हर एक को अपने अन्दर के
दरिन्दे को मिटाना होगा ।
हर एक कह अपने  अन्दर के
दरिन्दे को मिटाना होगा ।