पत्थर भी सागर में

22 Jun पत्थर भी सागर में

गहराती दिशाओं की आड़ में
एक हल्की सी लौ
मंद मंद मुस्कुरा रही थी
हर आते जाते को
एक पहेली पूछ रही थी
किसी के समझ ना आये
ऐसी करामात उसने कर दिखाई
भरी बारिश में वो लौ
मशाल बन लहराई
तेज हवाओं की सुलग
उसमे बस चुकी थी
देखने वालों में भी एक नयी
उमंग उमड़ चुकी थी
जीतना जो चाहता है
जीत कर दिखाता है
होंसला हो बुलंद तो
पत्थर भी सागर में
तर जाता है