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पत्थर भी सागर में

गहराती दिशाओं की आड़ में
एक हल्की सी लौ
मंद मंद मुस्कुरा रही थी
हर आते जाते को
एक पहेली पूछ रही थी
किसी के समझ ना आये
ऐसी करामात उसने कर दिखाई
भरी बारिश में वो लौ
मशाल बन लहराई
तेज हवाओं की सुलग
उसमे बस चुकी थी
देखने वालों में भी एक नयी
उमंग उमड़ चुकी थी
जीतना जो चाहता है
जीत कर दिखाता है
होंसला हो बुलंद तो
पत्थर भी सागर में
तर जाता है

This post was last modified on September 9, 2017 10:14 am