आर्यन -The Hero

14 Jun आर्यन -The Hero

रोज़गार की खोज में एक नौजवान निकल पड़ा था । किस ओर जाये इस ख्याल में जा बैठा पीपल की छांव में । किर ज्यों ही उसने आूँखें बंद की । ना जाने कब उसकी आँख लग गयी। दोपहर की शाम हो आयी। बांसुरी की मधुर धुन जैसे उसी को पुकार रही थी । सपनो की दुनिया उसे भरपूर संभाल रही थी। देर रात भूख के मार वो नींद से जागा । उसे किसी के कदमो की आवाज आयी। दो चोर खेत में से बोरियां चुराने की बातें कर रहे थे। नौजवान चुपके से उनके पीछे चल दिया। वो चोर जैसे ही चोरी को अंजाम देते उसके पहले युवक ने उन पर लाठियों से प्रहार कर दिया।
शोर सुन गाँव वाले इकटठे हो गए। जब उन्हें सारी बात पता चली तो पहले तो चोरों की जमकर पिटाई की । और उस युवक का धन्यवाद किया तथा उसकी आवभगत में लग गए। सुबह गाँव में यह बात आग की तरह फ़ैल गयी की किस तरह नौजवान ने बहादुरी का परिचय देते हुए चोरों की पर्ची काटी। युवक गाँव के बहुत कहने पर वो दो दिन के लिए उनका मेहमान हो गया। युवक गाँव की सैर को निकला । उसने देखा की गाँव में बिजली की समस्या है। इसी वजह से किसान कुएं से पानी निकाल कर सिंचाई कर रहे हैं। रात को भी अंधेरे का फायदा उठा चोर चोरी को अंजाम दे रहे थे।
नौजवान को ग्रामीणों की समस्या साफ़ साफ़ दिखायी दे गयी थी। क्यूंकि नौजवान पढ़ा लिखा था। उसे गाँव की समस्या का एक ही समाधान नज़र आया। और वो थी electricity । मगर गाँव में बिजली कैसे आएगी। युवक ने इतना भर सोचा ही था की एक ग्रामीण दुखी होता शहर से लौट रहा था । युवक ने पूछा भैया क्या हुआ । किसान कहने लगा शहर की मंडी बड़ा बुरा हाल है भाई , कितना ही बढ़िया किस्म का अनाज़ हो , किर भी मंडी में अच्छा भाव ही नहीं मिलता । तभी युवक को एक बात याद आयी ।
एक दिन जब वो चाय की दुकान पर चाय पी रहा था । कुछ लोग मंडी की ही तो बातें कर रहे थे , की कैस वो सब मिलकर मंडी में भाव घटाया व बढाया करते हैं। बेचारा किसान अच्छे दामों की आस में मंडी का गोदाम किराये पे लेता है । कुछ दिनों में किराए की रकम चुकाते चुकाते वो परेशान हो अनाज़ उन गिने चुने व्यापारियो को बेच जाता है । जो जानते बुझते अच्छे किस्म के अनाज़ को कम दाम में खरीदते हैं और बाज़ार में उसी अनाज़ के मुंह मांगे दाम मांगते हैं । बेचारा किसान करे भी तो कया करे। युवक सोच में था , की किस तरह से गाँव की मुसीबतों को दूर किया जाए।
वो खुद से ही सवाल कर रहा था , की आखिर हमारे कृषि -प्रधान देश में किसान की ऐसी कैसी दुर्दशा है। तभी उसे यह भी पता चला की गाँव में छोटी- मोटी संस्थाएं हैं वो किसानों को ऋण तो देती हैं पर बदले में भारी ब्याज वसूलती हैं। और अगर किसी कारण से ऋण न चुका पाएं तो उनकी ज़मीनों के कागज़ात विदेशी बैंकों ने गिरवी रख दिए जाते हैं । यह हमारे देश की त्रासदी ही है की युवा भी गाँव से शहर की और पलायन कर रहे हैं । और तो और एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखते । क्या हमारी पढाई हमें इतना भर भी लायक नहीं बनाती की हम उनके सुनहरे भविष्य की कल्पना कर सकें।
हम यह कयों नहीं समझते की अगर हमारे देश में किसान का ऐसा बुरा हाल होगा तो आने वाले वक्त में हमें शायद अनाज़ भी भारी मात्र में आयात करना पड़ेगा। क्यूंकि किसानों की अगली पीढ़ी अगर अपनी ज़मीनें builders को बेच देंगी तो हम चाह कर भी देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पे नहीं ला पायेंगे। युवक को समझ ही नहीं आ रहा था वो करे तो क्या करे । वो गाँव मदद करना चाहता था ।पर क्यूंकि वो स्वयं रोज़गार की तलाश कर रहा था ,वो चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा था।
युवक ने गाँव के कुछ पढ़े लिखे युवको से इस मसले पर बातचीत की उन्ही में एक जिसका नाम सुरेन था उसने युवक से उसका परिचय पूछा युवक ने बताया उसका नाम आर्यन है और वह इस गाँव के लिए कुछ करना चाहता है और साथ ही उन सभी का साथ । आर्यन वैसे भी उन सभी नज़रो में हीरो बन चुका था (कल रात की घटना के बाद) । सो सुरेन ने आश्वासन दिया की वो अपने सभी साथियों को एकत्रित करेगा और आगे की रणनीति के लिए कल सभी की आर्यन से मुलाकात भी करायेगा । आर्यन खुश था लेकिन एक बात उसे सोचने पर मजबूर कर रही थी की क्या सब उसका साथ देंगे ।
आर्यन ने कल की तैयारियाँ शुरू कर दी। भोर हो चुकी थी सुरेन सभी को लेके पहुूँचता ही होगा आर्यन सोच रहा था। जब सुरेन 10-12 साथियों के साथ आर्यन के पास पहुंचा और सुरेन न जब आर्यन का परीचय अपने साथियों से , यह कह करवाया की यही ह जो है हमारी ही उम्र के पर इनकी सोच हमसे कहीं आगे की है क्यूंकि जितना हम अपने गांव को जानते हैं उससे कहीं ज़्यादा इन्हें पता है हमारी और हमारे गाँव की असली समस्याएं । आर्यन ने सुरेन का शुक्रिया अदा किया और कहा की आप मुझ शर्मिदा कर रहे हैं | जो सपना हम सभी का है उसे अब हम सब ही मिल कर पूरा करेंगे।
राइ का पहाड़ बनाना – यह कहावत तो आपने सुनी ही होगी, ओर ना चाहते हुए भी हम इसे इतनी तन्मयता से अपन जीवन में उतारे हुए हैं की हमें भी नहीं मालूम, अगर हम इसे त्यागदे तो हम अपने आप के लिए ख़ुशी के कितने ही द्वार अपने लिए खोल सकते हैं । अगर उर्जा सही दिशा में लगाय जाए तो अविश्वनीय परिणाम आ सकते हैं। हम दिन भर में ना जाने कितने ही ख्याली पुलाव बनाते हैं, और सच्चाई के सामने आते ही हालातों को दोषी ठहराते हैं। धैर्य नाम के साथी का साथ हम लेना ही नहीं चाहते।
हम मंदिर जाते हैं पूजा करते हैं , मुराद मांगते हैं और टेलीफोन रिंग बजती है तो सोचते हैं भगवान् ने मेरा काम कर दिया। हम हमेशा output के बारे में सोचते हैं input apply करते वक्त भी। अगर माँ खाना बनात वक्त सही मसालों का इस्तेमाल ना करे तो क्या खाना स्वादिष्ट बना पाएगा? लक्ष्य की सोच कर अगर हमारे प्रयास में तेजी और पैनापन आता है तो हम अपनी मंजिल के और करीब आते हैं । वही negative approach रखने वाले हमेशा लक्ष्य और प्रयास किये जा रहे वक्त की स्थिति के बीच की खाई को ही नापते हैं और उदासीन हो जाते हैं।
सोच कर देखिए अगर 400m दौड़ में runner अगर हर 100m पर घडी देखे तो क्या वो  अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर पायेगा। जरूरत तो है घडी देखने की पर उस समय जब 400m का distance cover हो जाए। हमें समझना होगा की हर प्रयास हमें लक्ष्य की ओर ही धकेलता है, बशर्त अगर हम विफलता का आकलन कर अपनी नकारात्मकता को दूर करें । हम क्यों विफल होने पर हालातों को दोषी ठहराते हैं। वही अगर सफल हो जाएँ तो उन हालातों के बारे में ज्यादा ना सोचते हुए इस सफलता को अपना मान लेते हैं। पर यह सफलता नाममात्र है।
सफलता में इन हालातों के मायने आप विवेकानन्द , रानी लक्ष्मीबाई , शहीद भगत सिंह से जानिये । इन सभी के लिए सफलता प्रयासों में निहित थी। ना की किसी विषय – वस्तु की प्राप्ति में। आज हमारे लिए सफलता का मतलब है , अपने काम की तारीफ़ बॉस के द्वारा , करीबी दोस्तों के द्वारा, परिवार के द्वारा आदि । इसका मतलब मैं , मेरे कार्य दूसरों के मोहताज रहते हैं। मैं अपनी असफलता का बखान दिन में जाने  कितनी बार खुद से , अपने दोस्तों से करता हूँ। पर मेरी सफलता को , उसके लिए किये गए मेरे प्रयत्नों को ज़ुबान नहीं मिलती।
हम क्यों खुद ही को कमजोर बनाय जा रहे हैं। कुछ बुरा होने के पहले हम खुद को इतना डरा देते हैं की हम ही खुद को खुद ही से अलग कर देते हैं , तो हम अपने इस बुरा वक्त में किसी ओर से क्या उम्मीद लगा सकते हैं। कई बार तो हम खुद को दया का पात्र तक बना बैठते हैं। अगर गेंदबाज़ और बल्लेबाज़ अपनी पुरानी performances की सोच को खुद पर हावी करेंगे त वो कभी भी अपना सर्वश्रेष्ट्र नहीं देगे । Confusion को अगर अपनी जिन्दगी से आउट करना है तो उसका सबसे आसान तरीका है priority set , जी हाँ अपने जीवन में अपने करीबियों को priority no. देना शुरू कर दे । अपने परिवार , दोस्तों , ऑकिस , girl friend और सबसे जरुरी आपका लक्ष्य , सभी को no. देकर क्रम बद्ध कर दीजिये और कुछ समय की practice के बाद आप इस क्रिया में सहज महसूस करेंगे ।

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चुनौतियों की कसक पे
खरा उतरूंगा
बेलगाम दौड़ते इस वक़्त के
हर इम्तिहान की कसौटी पे
मैं खुद को परखूगा
जो कुछ ना कर सका
अपने डर को ना हर सका
तो कह दूगा इस दुनिया से
चला था अपनी हस्ती बनाने को
कया हुआ जो राख में मिल गयी
हमारे सपनो की उड़ाने
किर भी……….
हम भूलेंगे नहीं
हम टूटेंगें नहीं
क्योंकि हम हैं
अपने सपनों के दीवाने
सच्चे परवाने
हर फिक्र से अनजाने
बस कहते रहो खुद से
करना है करेंगे
हर चुनौती से लड़ेंगे
और…………..
अपने डर से ना डरेंगे

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“जो हारना जानता है उसे जितने से कोई नहीं रोक सकता”

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हम वर्तमान में कार्य की विधि और उसकी पूर्णता पर ध्यान केंद्रित करने की वजह , भविष्य में उसके द्वारा प्राप्त होने वाली सुविधाओं पर क्यों ध्यान क्रेंदित करते हैं। जीवन में हर कार्य के होने का अपना से होता है । उदाहरणार्थ :- किसान कृषि के शुरूआती समय अपना पूरा ध्यान ज़मीन की किस्म व मौसम के आधार पर फल, सब्जी अन्यथा अनाज का चयन न करे और साथ ही साथ ज़मीन की पोषकता को बढ़ाने के उपाय ना करे । तो क्या अच्छी फसल की उम्मीद क जा सकती है । इसी सवाल में हमारा जवाब छुपा है ।
आर्यन की बातों का जादू सभी पर हो चुका था। और अब सब आर्यन का साथ देने को तत्पर नज़र आ रहे थे । अब सभी आर्यन से यही जानना चाहते थे , की शुरुवात कहाँ से और कैसे की जाए । आर्यन ने बताया की शुरुवात हमें अपने घर से ही करनी है । हमें अपने – अपने खेतों की फल और सब्जियां एक जगह एकत्रित करनी होंगी । अब हम मंडी के भरोसे अपनी मेहनत को यूँही ज़ाया होते नहीं देख सकते हमें मंडी के सामानांतर अपनी स्वयं की मंडी खड़ी करनी ही होगी और इसके लिए हम technology का साथ लेंगे और स्वयं की ऑनलाइन मंडी भी बनाएंगे जहां आस-पास के गाँव और शहरों में हम अपने हल , सब्जियां व अनाज की पैदावार से पहले ही बुकिंग भी कर सकेंगे । शुरुवात में थोड़ी सी मुश्किल होगी और उससे बचने का एक तरीका है की हम अपनी पैदावार का 25℅ हिस्सा ही शुरू में स्वयं बेचेंगे और बाकी बचा 75℅ शहर की मंडी में । हम ऑनलाइन बुकिंग के साथ अपनी पैदावार को छोटे-छोटे outlets के द्वारा आस-पास के गाँव और शहरों में बेचेंगे । साथ ही अपनी ऑनलाइन बुकिंग का प्रचार भी उन outlets पर करेंगे । हमारा second step होगा ज़्यादा से ज़्यादा गाँवों को अपनी मुहिम का हिस्सा बनाना । क्योंकि ऐसा करने से हमारी पैदावार का market स्वतः ही बढ़ जायेगा और साथ ही अन्य गाँवों का भी । धीरे-धीरे हमारी शहर की मंडी पर dependency कम हो जायेगी और उन की कालाबाज़ारी पे लगाम भी लग जाएगी ।