कथा गौशाला की

17 Jun कथा गौशाला की

नदी के दोनों किनारों पर शहर बसे थे | एक शहर में रहन वाले अपने गुजर – बसर के लिए मछलियों पर आर्षित थे | जिसके लिए वह लोग बिना मोटर वाली गाड़ी का प्रयोग किया करते थे | वह शहर था त्रिशाल जहां पर्यटकों का आना –  जाना लगा रहता था | बस्त वाले यहाँ मछली बेचन  जरुर आते थे | सवेरे – सवेरे वहाँ मंडी लग जाती | कुछ 10-15
लोग यहाँ मछली बेचने आते थे और मछलियों की बोलिया लगाते |
जो अच्छी बोली लगाता उस बिचोलिये को सारी मछलिया बेच, वो अपनी बस्ती को लौट जाते | इन्हीं में से कुछ कमाए हुए धन से कुछ ऐसा सामान खरीदते जिसे बस्ती में बेच जा सके | त्रिशाला में होटल व्यवसाय अपने चरम पे था | पर्यटन भी खूब फल फूल रहा था | इन्हीं होटल व्यवसायियों की वजह से बस्त वालो की मछिलिया आसानी से बिक जाती थी |
यह तो हुई त्रिशाला की बात क्यूँ न अब बात क जाए गौशाला की , जो और कोई नहीं त्रिशाला की बहिन है | गौशाला भी नदी किनारे ही बसी थी | जिसे पूजने श्रद्धालु दूर – दूर से आया करते थे | यहाँ मांस-मछली का नाम लेना भी पाप था | गाय की पूजा की जाती , सेवा की जाती बायोगैस प्लांट भी थ वहाँ , नदी के बहाव को विधुत में बदलने की योजना भी क्रियान्वित हो चुकी थी | साफ़ पानी , लहलहाते खेल जहां कोई भी ना था सेठ | सब अच्छा खाते , दूध पीते और मौज में जीते |
त्रिशाला में रहने मछलियो क जब गौशाला के बारे में पता चला तो सभी ने एक राय के साथ त्रिशाला को छोड़ने का प्रस्ताव पारित किया | अब सभी मछलिया ही ना रही तो लोगो के भूखे मरने के दिन आ गए , होटल व्यवसायी भी परेशान थे , और मछलियों के मुंह मांगे दाम भी देने को तैयार थे | पर जब मछलिया ही नहीं बची तो को क्या करे | आखिर कोई कितना सहे | जहां त्रिशाला में एक समय पर्यटकों का हुजूम लगा रहता था , वही उनकी तादाद ना के बराबर हो गयी क्यूंकि ज्यादातर पर्यटक बाहर देश के थे, जो मांस-मच्छी पसंद करते थे पर जब उन्हें भोजन में यह सब नहीं मिला तो उन्होंन वहाँ आना कम कर दिया और धीरे-धीरे बिलकुल बंद | त्रिशाला की वित्तीय स्थिती दयनीय हो चुकी थी | बहुत समय बाद त्रिशाला में आये एक पर्यटक ने जब देखा की हालात नाज़ुक है तो उसने जानने की कोशिश की और उसे पता चला की अब यहाँ मछलिया नहीं मिलती | नदी के रास्ते ही वह आया था और उसी रास्ते उसने जाने का निर्णय लिया , आगे जब वह गौशाला की तरफ गया तो देखा की यहाँ तो मछलियों के झुण्ड के झुण्ड हैं | एक बार को तो उसे यकीन ही नहीं हुआ , दुसरे ही क्षण उसे तरकीब आयी की क्यूँ ना मछलियों को यहाँ से पकड़ कर त्रिशाला में बेच जाए | यह तो धन कमाने का आसान तरीका होगा | उसने एक लड़के को कुछ रूपये दिया और उससे मछलियों को पकड़ने को कहा | पैसों के लालच में उसने मछलिया पकड़ कर इस पर्यटक को दे दी |
जब वह लड़का घर पर पैसा ले गया और उसके पिताजी ने पूछा बेटा पैसे कहाँ से लाये , तो उसने सारी बात बता दी | पिता ने लड़के को समझाया की ,ऐसा करना अच्छा काम नहीं | इस तरह तो उस जिव – हत्या का पाप लग गया है और आगे से उसे ऐसी गलती ना करने की तथा अगर कोई फिर से ऐसा करने को कहे तो स्वयं को बताने के लिए कहा | अगले दिन जब वह पर्यटक फिर से यहाँ आया तो , गौशाला के लोगों ने उसे पकड़ लिया और उसे यहाँ की आस्थाओं से अवगत कराया | तभ वो पर्यटक खुद को दोषी समझ रोने लगा और प्रायश्चित करने की बात सोचने लगा | गौशाला में आकर वह चकित हो गया था | जब वह अपने देश लौटा तो उसने सभी को गौशाला की बात कह सुनाई | इस तरह गौशाला में देखते ही देखते पर्यटकों का हुजूम सा दिखने लगा l|अब हर हर शहर हौशला जैसा और सोचना चाहता था | संचार क्रांति के कारण गौशाला इन्टरनेट की दुनिया पर छा गई | दुसरे देश के लोग यहाँ की ही तरह अब गायों की सेवा करने लगे | धीरे – धीरे बीमारियों का नामो निशान भी इस दुनिया से जाता रहा | त्रिशाला भी अब गौशाला जैसा दिखाई देती थी |
त्रिशाला को यह बात रास नहीं आई , की उसकी बहिन का नाम पुरे विश्व में फ़ैल रहा है | त्रिशाला ने सोचा की वह तपस्या करेगी और उसे उसका फल भी मिलेगा क्यूंकि अब वो भी पवित्र हो चुकी है (त्रिशाला में लोग गौसेवा जो करते हैं ) | सदियाँ गुजर गयी त्रिशाला तप करती रही , अंततः प्रभु प्रकट हुए और उससे वर मांगने को कहा | त्रिशाला ने माँगा की उसका नाम पुरी दुनिया में फ़ैल जाए , वो जो कुछ भी करें उसे पाप ना चढ़े , चाह जीव हत्या ही क्यूँ ना हो | साथ ही साथ लोगो को गौशाला का नाम भी याद ना रहे | जैसे ही त्रिशाला ने अपनी बात कही , उसकी आँखे चौंधिया गयी और उसने देखा की समस्त देवी – देवता गौशाला की काया में समाये हैं l यह देख वह हैरान थी | वह परेशान थी की जिसे वह अपनी शत्रु समझती थी वह तो जगतमाता है | जगतमाता ने कहा तथास्तु , त्रिशाला यह सुन अवाक रह गयी | यह सब उसकी सोच के विपरीत था | फिर जगतमाता अर्द्श्य हो गयी | त्रिशाल फुले नहीं समा रही थी l अब जब उसे वर मिल ही चुका था , जो श्राप से कम ना था | तभी त्रिशाला में एक भंवर सा उठा और त्रिशाला पाताल में पहुच गयी ,  गौशला से बहुत दूर |
यहाँ पाताल में कोई भी गौशाला को नहीं जानता था और तो और इस घटना के बाद पुरी दुनिया में त्रिशाला की चर्चा होने लगी क्यूंकि रातोंरात त्रिशाला का नामो- निशान मिट चुका था | एक और त्रिशाला परेशान थी l वही पाताल म जीव हत्या एक आम बात थी | त्रिशाला को बंदी बना लिया गया क्यूंकि पाताल वासियों ने सोचा यह त्रिशाला की एक चाल है , ताकि वो पाताल पर राज कर सके क्यूंकि उन्हें त्रिशाला के तप के बारे में ज्ञान था |
पाताल भी त्रिशाला की काया देख मोहित हो गया तथा हाथों – हाथ उसने त्रिशाला के सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया | त्रिशाला ने जान बचाने की खातिर उसका यह प्रस्ताव मंजूर कर लिया | पाताल में जश्न होने लगा | अब त्रिशाला और पाताल में कोई फर्क नही रहा | कहते हैं न सांगत का असर होता है | जैसे गौशाला असर बाकी दुनिया की काया पर हुआ | उनकी सोच पर हुआ | पर जलन की वजह से त्रिशाला को अपना भला ही नागवार जुगार और अंततः उसे ना चाहते हुए भी पाताल से विवाह करना पडा | पाताल त्रिशाला पर कुछ ज्यादा ही मोहित था | एक दिन त्रिशाला ने पाताल को सारी बात बता दी | पाताल ने पूछा की तुम मुझसे कया चाहती हो | उसने कहा आप मेरे स्वामी हैं | अतः मेरे शत्रु आपके शत्रु , मेरी प्रतिज्ञा आपकी प्रतिज्ञा पाताल तो वैसे ही त्रिशाला पर मोहित था | सो वह अपनी धर्म पत्नी के लिए गौशाला पर हमला करने की तैयारी करने लगा | वह जब गौशाला पर हमला करने गया तो उन्हीं पर मोहित हो गया और वही का होकर रह गया | वह गौशाला को निहारता दिन – रात बिताने लगा , वो सोच में पड़ गया की गौशाला कैसे किसी की शत्रु हो सकती है | अतः वह चाहते हुए भी गौशाला पर हमला ना कर सका और वही  बस जाने की सोचने लगा पर कुछ समय बाद उसने सोचा की त्रिशाला को समझाना होगा और उसे बताना होगा की बेवजह की शत्रुता में किसी का फायदा नहीं | जब पाताल त्रिशाला से दूर था , तो त्रिशाला भी अपने पति के बिना बमुश्किल वक्त बिता पा रही थी | अतः उसने पाताल के पास जाने का निश्चय किया पाताल के बदले हुए रूप को देखकर हैरान थी , उसे लगा की उसका पति गौशाला के प्रेम में पड़ गया है | जब वह पाताल के पास गयी तो , पाताल ने उसे बहुत समझाया | त्रिशाला को मन में तसल्ली हुई की मेरा पति अब भी मुझसे ही प्रेम करता है और मेरे कहने पर गौशाला पर हमला करने को अब भी तैयार है ,पर वह यह भ जानती है की इस सब में खोना तो उसे ही अपने पति को पड़ेगा | अतः पति अपने पति के साथ पाताल लौट गयी |