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17 Aug

किस चिंता में मैं दौड़ चला

किस चिंता में मैं दौड़ चला

उस बेरंग दिशा की और

देखा तो शर्मिंदा हुआ

सोच में पड़ा

क्यों पकड़ी ऐसी पतंग की डोर

सोच में मेरी क्यों खोट हुई

क्यों मन आँगन आया मेर चोर

भटकन को मजबूर हुआ

ठोकर खायी सो मजबूत हुआ

भले-बुरे का बोध हुआ

और हमने फिर सोच लिया

धीरे धीरे ही सही

पहुंचेगे कही न कहीं

जहा होगी हमारी भी पहचान

कहलायेगे इक दिन

हम भी एक इन्सान

 

15 Jun

मेरी पहचान

कभी-कभी मन में आता है की सब शोर शांत हो लिए , कहीं दूर जाएँ और खुद से मुलाक़ात कर आयें पर इंसान इस कदर दुनियादारी में उलझा पड़ा है की मंदिर जाने के पहले भी उसे स्वयं का अपॉइंटमेंट लेना पड़ता है ।मगर जरा सोच के देखो क्या ऐसा हो सकता है की हम इस दुनिया में रहके इससे अलग हो जाएँ ।पर एक काम जरुर कर सकते हैं । वो है स्वयं की एक अलग दुनिया बसाएं । जो पसंद ह वो स्वयं करें मस्ती में जिएं यह जीवन यूँही चलता रहेगा हमारे चेहरे बदलते रहेंगे । पर कितनी ही सदियाँ बीत जाएँ , हम अपने अस्तित्व को चाह के भी नहीं मिटा पाएंगे । जो कोशिश करनी ही है तो खुद की कमियों को दूर करने की करें , बाकी सबकुछ हमारी राह ढूंढता हमारी ओर आ जायेगा ।
नदी किनारे एक साधु बैठे ताप कर रहे थे । तभी एक पुरुष रोता – रोता साधु के पास आया और बोलने लगा मेरा पूरा परिवार मुझे छोड़ गया । मुझे अपन शरण ले लो अब तो यह जीवन आपकी ही सेवा में गुजरना चाहता हूँ ।
साधु बाबा ने उसके सर पे हाथ फेरते कहा बेटा हम तो दिन रात यहीं ताप करते हैं , उस प्रभु को याद करते हैं । जो तुम हमारी सेवा करोगे तो हमारा ध्यान भटक जाएगा । तुम भी यहीं बैठ जाओ और उस प्रभु का ध्यान करो बाबा पर में अपने परिवार को खोके कैसे …….. और वो रोने लगा । बाबा बोले बेटे जैसी करनी वैसी भरनी |
तभ वो रोते-रोते रुका और बोला बाबा मैं तो हर पल अपने परिवार की खुशियों के बारे में सोचता और करता था । कहीं कोई दुःख उन्हें घेर ना ले इसलिए आगे से आगे उनकी हर ख्वाहिश का ख्याल रखता था ।
तभी बाबा बोले हम आज की बात नहीं कर रहे पिछले जन्म में तूने अपने परिवार को बहुत दुःख दिए , कभी-भी उनकी परवाह नहीं की , न माता – पिता की , ना धर्म पत्नी की यहाँ तक की अपने बच्चो की भी नहीं । तब तूने उनके साथ रहते भी उनका कभी साथ नहीं दिया । इसी कारण वो आज तुम्हे छोड़ के चले गए । पर वो किर से तुम्हार जीवन में आयेंगे और कहीं फिर से तुम वो गलती ना दोहराओ इसलिए कहता हूँ की उस प्रभु का स्मरण करो और उस प्रकाश को अपन जीवन में विराजमान करो की अन्धकार कितना ही छा जाए तुम्हारे अन्दर जो लौ जलती रहे आने वाला वक्त बड़ा बलवान होता है जरुरी है इस पल का सदुपयोग और इतनी बात सुनते ही वो वहाँ से उठा और अलग जाकर प्रभु का स्मरण करने लगा । बरसो तपस्या करने के बाद वो प्रभु को प्यारा हुआ और किर से इस धरती पे जन्म लिया । बचपन गुजरा , जवानी आई , धीरे-धीरे उसके भीतर एक हलचल सी होने लगी और उसे मंदिर जाकर वक्त बिताना अच्छा लगने लगा परन्तु धीरे-धीरे उसमे आडम्बर के प्रति आकर्षण जागने लगा , जीवन यूही गुजरने लगा ।
उसकी भक्ति की चर्चा चारो और होने लगी । लोग अपनी समस्याएं लेकर उनके पास आते और उनसे हल बताने की कृपा करत जल्द ही उनका प्रभु के पुत्र के रूप में गुणगान होने लगा। लोग उन पर आँखे मूँद कर विश्वास करने लगे । पर कहते है ना जब लोग आप के पीछे चलने लगते है तो कई बार ऐसा होता है की उनका मार्गदर्शन भी अपना ध्यान भटक जाता है । उसे पद का मोह , अपना अभिनन्दन रास आने लगता है और दूसरो को राह दिखता – दिखता खुद ही भटक जाता है | जहाँ पहल वो हर कार्य के पहले प्रभु का स्मरण करता था , वही अब वो चाटुकारों से घिरा रहने लगा तथा इंसानों को उंच-नीच की भावना से देखने लगा उसके चाटुकारों की सोच उस पर हावी होने लगी ।
तभी उसने एक विवादित फैसला लिया । कथित नीच जाती वालो के मंदिर में प्रवेश पर रोक लगा दी । कुछ दिन यूँही बीत गए । फिर एक दिन उन्हीं के कुछ शिष्यों ने षड्यंत्र कर उन्हें जहर खिला दिया । इस प्रकार वे फिर से अपन शरीर छोड़ गए । कुछ समय पश्चात जब उनके द्वारा रचित उंच – नीच का भेदभाव पुरे समाज को ग्रास बन निगल रहा था तब एक निर्धन तथा कथित नीच परिवार में उन्होंने फिर से जन्म लिया । आज उन्हें उसी मंदिर में जाने की अनुमति ना थी जहां क वो सर्वसर्वा हुआ करते थे । उन्होंने कई प्रयास किये ताकि यह भेदभाव मिटाया जा सके । उन्होंने इश्वर की उपासना का अनूठा तरीका ढूढ निकाला उन्होंने कहा इश्वर मंदिर में ही नहीं अन्यथा सर्वत्र हैं । हम सब में विराजमान हैं इन सब बातों का मैथ वालो ने खुलकर विरोध किया । पर धीरे – धीरे लोग उन्हें सुनने दूर – दूर से आने लगे , पर समाज क ठेकेदारों को यह सब नामंजूर था । अतः उन्होंने उन्हें उनके परिवार सहित कहीं दूर समुंद्र पार कारावास में डलवा दिया । एक – एक कर परिवार का हर सदस्य संसार को चद चला गया और उन्हें भी अधमर जान नदी किनारे फेक दिया गया | वहाँ उनकी भेंट उन्हीं साधु से हुयी । उन्होंने साधु को प्रणाम किया साधु ने उनके सर पे हाथ फेरा तो उन्हें सारे पिछल जन्मो का ज्ञान हो आया । जैसे  ही साधु की आूँखों में देखा उन्हें अपनी गलती का एहसास हो गया और परिवार बिना खुद को निर्जीव समझ अपनी देह त्याग दी ।
आखिर ऐसा क्या हुआ की साधु की आँखों में देखते ही उन्हें अपने परिवार की याद आई और उन्होंने क्यूँ सवाल नहीं किया की मेरे साथ ऐसा क्यूँ हुआ। दरअसल उन्हें समझ आ गया क जो जीवन हमें प्रभु ने दिया है उसका सही अर्थ तभी निकलेग जब हम उनके द्वारा सौंपे गए हर कर्म का निर्वाह सही से करें , ना की हमें अपनी जिम्मेदारियों से भागना है , इस तरह हमें खुद को देवता समझने की भूल भी नहीं करनी अन्यथा उसका प्रायश्चित हमें अपनों से दूर रहकर ही करना पड़ेगा । एक इंसान के लिए सबस जरूरी कुछ है तो अपने परिवार के हितों का ध्यान रखना , उन्हें प्यार करना , अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करना ।
अब जब वे पुनः इस प्रथ्वी पर लौटे तो अपने परिवार की हर छोटी – बड़ी ख़ुशी समझते थे । अपने परिवार के संग समय व्यतीत करते तथा काम मन लगाकर करते , झूठे दिखावे से दूर रहते किसी की तारीफ़ सुन सातवे आसमान में नहीं चढ़ते । अपने परिवार के लिए कुछ करके ही उन्हें ख़ुशी मिलती । इस तरह प्यार की राह पर चलते – चलते उन्होंने अपना यह जीवन बिताया ।

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दूर हुई
उनक जीवन से मोह माया ।
बदल गयी उनकी काया ।
भरी धुप में भी रहती थी
उनके जीवन में छाया ।
आज जाके मैंन जीने का
असली ढंग पाया ।
खुशनसीब हूँ की मैंने ऐसा
सुंदर परिवार पाया ।

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14 Jun

अब हार पे मुस्कुराना भी आ जायेगा

अब हार पे मुस्कुराना भी आ जायेगा
तेरे प्यार में रहे तो खिलखिलाना भी आ जायेगा
मुश्किलो से भला हम क्यु डरें
तेरा साथ मिला है जब से
आँखोंमें नए नए सपने से हैं भरे
आसान हो गया है अब जीना
वो वक़्त पीछे छूटा
जब रखना होता था होठों को सीना
अब गुनगुनाने में दिल बहल जाता है
तुम पास हो ना हो
जिक्र तुम्हार खुद ही से हो जाता है
तेरे आने की दस्तक सुनते ही
दिन कब कैसे
इंतज़ार में तुम्हारे
हाथों से फिसल सा जाता है
अब तो तुमसे मिलके ही
यह दिल सुकून को पाता है
कई दफा तनहा रातों में
तुम्हारी हसरत में
यह मन मचल भी जाता है
अब तो बहती हवाओं की धुन में भी
नाम तुम्हारा ही सुनने को
जी चाहता है