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17 Aug

किस चिंता में मैं दौड़ चला

किस चिंता में मैं दौड़ चला

उस बेरंग दिशा की और

देखा तो शर्मिंदा हुआ

सोच में पड़ा

क्यों पकड़ी ऐसी पतंग की डोर

सोच में मेरी क्यों खोट हुई

क्यों मन आँगन आया मेर चोर

भटकन को मजबूर हुआ

ठोकर खायी सो मजबूत हुआ

भले-बुरे का बोध हुआ

और हमने फिर सोच लिया

धीरे धीरे ही सही

पहुंचेगे कही न कहीं

जहा होगी हमारी भी पहचान

कहलायेगे इक दिन

हम भी एक इन्सान

 

16 Jun

दिल की भी तुम सुना करो

भविष्य को सवारने की खातिर एक कदम बढाओ
खुद की सोच को उस काबिल बनाओ
परवाह अपने सपनो की किया करो
एक कदम ही सही पर उस और बढ़ा करो
ज़िंदगी को अपनी कुछ इस तरह जिया करो
दुनिया कया सोचेगी इस परपंच में ना उलझा करो
समझो ज़रा खुद को
कभी कभी अपने दिल की भी तुम सुना करो

15 Jun

संभाला तुम्ही ने अपने आँचल में

मेरी हर हार के बाद
आयी तेरे होठों पे मुस्कान
मेरे सूखे प्याले में भर जाए
खुशियाँ कुछ ऐसे थे मेरे अरमान
हाँ में था नादान
मुझे इल्म ही न था
तू ही है मेरी सच्ची कदरदान
संभाला तुम्ही ने अपने आँचल में
बाँधा मेरी हर बूँद को बरसाती बादल में
इस दफा कुछ ऐसा बरसयूँगा
हारू या जीतू मैं बस झुमुँगा