sad poem Tag

19 Aug

क्या कभी किसी रोज

क्या कभी किसी रोज

वो दिन आएगा

जब तुम्हारे दिल से

वो पुराना दर्द मिट जाएगा

अपनी चुप्पी से मुझे क्यों

बारम्बार कातिल होने का

एहसास कराती हो

क्या तुम मेरे दिल में बैठे

दर्द को पहचानती हो

अब एक एक बात से

काँटों सा एहसास कराती हो

अपने दिल की बात

भला मुझीसे छुपाती हो

वैसे तो हमारी हमदर्द कहलाती हो

और न जाने कितने दर्द

अपने दिल में छुपाती हो

शायद अब तुम्हे मेरी जरुरत नहीं

मैं भी एक इंसान हूँ कोई मूरत नही

यही खड़े-खड़े

इंतजार तुम्हारा कर लेगे

आज नही कल सही

यह कह कहके

जिन्दगी का गुजरा कर लेगें

05 Aug

आशा को तुम्हारी|

आशा को तुम्हारी

तन्नाओ को हमारी

चाहत को तुम्हारी

कोशिशों को हमारी

मंजिलो के दायरे में खुद को यूँ बांध दिया था

क्यूकि अपनों की खातिर ठानी थी कुछ करने की

फिर अपनों ने ही सवाल किये

अपनों ने ही इलजाम दिए

बेहतरी को उनकी मुकाम समझा था

इस बीच उन्होंने हमें न जाने क्या क्या समझा था

कहते हैं जख्म और जहर हम ही से हैं

उन्हें नहीं पता फ़िकर में उनकी हम कब ही से हैं

कुछ साल गुज़र जाने दो

दौर वो भी जल्द आएगा

जब तुम्हारे दिल में भी बस नाम हमार रह जायेगा

बस नाम हमारा रह जाएगा

01 Jul

जिन्दगी में

कुछ ख्वाब अधूरे रह गए|
मौत की ख्वाहिश में
न जाने कितने पल
जीवन से महरूम रह गए|
हाथ कुछ ना आया
और हम मजबूर हो गए|
बेबस समझ खुद को
जाने क्यों दुनिया को
अलविदा कह गए|
मौत कि तलाश में
किसी के प्यार में
हम गुमनाम हो गए|
परछायी से खुद ही की
हम पूछ रहे,
क्यों अब तलक
हमारे साथ है|
जिस कि ख्वाहिश हमने की
वो आज किसी और की
परछायी है|
हमारी गुमनामी
जीवन मे उनके
क्या खुब रंगत लेकर आयी है|